उत्तर प्रदेश

6 महीने बाद ही यूपी में विपक्ष की एक और अग्निपरीक्षा, क्या कर सकेंगे मुकाबला ?

2019 के लोकसभा चुनावों में भारी जीत के बाद जहां भाजपा के खेमे में उत्‍साह का आलम है वहीं यूपी में हालात अलग हैं. यहां विपक्ष पस्‍त हिम्‍मत है. अभी उसे समझ में नहीं आ रहा है कि करना क्‍या है. यूपी के सभी विपक्षी दल हार के सदमे से उबरे नहीं हैं और लगातार इसकी समीक्षा कर रहे हैं. ऐसे में कयासों का बाजार गर्म है. इतना पस्‍त हिम्‍मत विपक्ष इसके पहले 2014 में कुछ दिनों के लिए दिखा था. उसके बाद जब गोरखपुर, फूलपुर और कैराना के उपचुनाव हुए तो विपक्ष एक बार पुन: उठ खड़ा हुआ और भाजपा से सीटें छीनकर उसमें थोड़ी जान आयी. 2019 के चुनाव में पुन: वही स्थिति है. कांग्रेस के पास एक सीट है, सपा के पास पांच और बसपा के पास दस सीटें हैं. ऐसी हालत में 2022 में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भी तैयारी कैसे की जायेगी इसे लेकर भी सभी पसोपेश में हैं.

कैसे इकट्ठा होकर करें सामना?-

फिलहाल गैर भाजपा दलों की चिंता यही है कि भाजपा का सामना मिलकर किया जाये या अलग-अलग रूप से. इसकी एक बड़ी वजह भी है. यूपी में अगर सभी गैर भाजपा दलों का वोट शेयर मिला लिया जाये तो महज 42 प्रतिशत बैठता है जबकि भाजपा का 51 प्रतिशत. इस हिसाब से भी देखा जाये तो विपक्ष कमजोर स्थिति में है.

फिलवक्‍त विपक्ष बेहद कमजोर-

यूपी की सभी 80 लोकसभा सीटों का वोट प्रतिशत यह बयां कर रहा है कि फिलवक्‍त विपक्ष बेहद कमजोर हालत में है. बीएसपी को मिले हैं 19 फीसदी वोट, जबकि समाजवादी पार्टी का आंकड़ा महज 17 फीसदी रह गया है. कांग्रेस के खाते में महज 6 प्रतिशत वोट ही आया है.

विपक्ष कैसे सामना करेगा उपचुनावों का?-

यूपी में विपक्षी दलों के सामने स्थिति यह है कि उन्‍हें छह माह बाद विधानसभा की 11 सीटों पर होने वाले उपचुनावों में जाना है. बीते सालों में यूपी में उपचुनावों ने ही उन्‍हें ताकत दी थी. अब पुन: उन्‍हें वही ताकत उपचुनावों के जरिये 2022 विधानसभा चुनावों से पहले हासिल कर लेनी होगी. इसलिए अब विपक्ष के पास रोने-धोने का भी समय नहीं है. उसे सबकुछ भूलकर पुन: उठ खड़ा होना होगा और कामयाबी की सीढि़यां चढ़नी होगी. ऐसा माना जाता है कि उपचुनावों से ही विपक्ष को ताकत भी मिलती है.

इसकी वजह यह है कि लोकसभा के लिए चुने गये 11 सांसद यूपी की अलग-अलग विधानसभा सीटों से विधायक हैं. ऐसे सभी सांसदों को विधायक पद से इस्‍तीफा देना होगा. इन 11 विधायकों में आठ भाजपा और एक सहयोगी अपना दल का है. सपा और बसपा के एक-एक विधायक हैं.

जिन 11 सीटों पर उपचुनाव होना है वे हैं- टूंडला, गोविंद नगर, लखनऊ कैंट, प्रतापगढ़, गंगोह, मानिकपुर, जैदपुर, बलहा, इगलास, रामपुर सदर और जलालपुर.

छह माह में ही विपक्ष को दिखानी होगी ताकत-

लोकसभा चुनावों के बाद यह पहला अवसर होगा जब विपक्ष को अपनी ताकत दिखानी होगी. वजह यह है कि भाजपा उत्‍साह से लबरेज है. ऐसे में उसे परास्‍त करना कोई आसान काम नहीं होगा. हालांकि यह तय नहीं है कि विपक्ष इसका समाना कैसे करेगा. अभी वह खुद सदमे में है. 2022 चुनावों से पहले उसे खुद को प्रासंगिक बनाने के लिए अग्निपथ पर चलना होगा.

रणनीति अभी तय नहीं-

विपक्ष की रणनीति अभी तय नहीं है. कुछ हल्‍कों से यह खबर आ रही है कि कांग्रेस शायद इस उपचुनाव पर फोकस न करे और अन्‍यान्‍य प्रदेशों में जो विधानसभा चुनाव होने हैं उनपर केंद्रित करे.

ऐसी स्थिति में सभी की नजरें इस ओर हैं कि विपक्षी दल कितनी जल्‍दी अपनी खोई ताकत बटोरकर उपचुनावों में उतरते हैं. वैसे संभावना यही है कि महागठबंधन ही चुनाव लड़ेगा और सत्‍तारूढ़ दल को अपनी ताकत का एहसास कराने का प्रयास करेगा. कुछ क्षेत्रों में ऐसी भी अटकलें हैं कि सपा, बसपा और रालोद अलग-अलग भी लड़ सकते हैं. अधिकांश लोगों का मानना है कि विपक्ष इकट्ठे ही लड़ेगा क्‍योंकि बसपा सुप्रीमो मायावती ने पहले ही स्‍पष्‍ट कर दिया है कि सपा-बसपा और रालोद के वोट एक दूसरे में सफलतापूर्वक ट्रांसफर हुए हैं. इसके बावजूद इसका कोई स्‍पष्‍ट जवाब नहीं आ पा रहा है. मगर अधिकांश लोगों का ही यह मानना है कि गठबंधन चलता रहेगा और संयुक्‍त विपक्ष का एक ही उम्‍मीदवार विधानसभा उपचुनाव लड़ेगा और पूरी ताकत से सत्‍तारूढ़ दल को कड़ी टक्‍कर देने की कोशिश करेगा.

यह देखना बेहद दिलचस्‍प होगा कि सामाजिक न्‍याय के नाम पर 25 साल पुरानी दुश्‍मनी भूलकर सपा-बसपा साथ आकर कोई कमाल दिखा पाती है या नहीं क्‍योंकि 2019 के चुनाव में इस साथ को लोगों ने नकार दिया है और कांग्रेस एक सीट पर, सपा पांच सीटों पर और बसपा दस सीटों पर सिमट आयी है. उपचुनावों में ये मिलकर भाजपा का कैसे सामना करते हैं यह यक्ष प्रश्‍न बना हुआ है.

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