उत्तर प्रदेश

UP में कोरोना: बुजुर्ग ने अस्पताल के बाहर 2 दिन किया बेड का इंतजार, मिला तो जा चुकी थी जान

उत्तर प्रदेश में कोरोना का संक्रमण कहर बरपा रहा है। राजधानी लखनऊ की सबसे ज्यादा खराब है। यहां एक 60 साल के कोरोना मरीज अलीगंज निवासी सुशील कुमार श्रीवास्तव को लेकर उनके परिजन कार में ऑक्सीजन सिलेंडर के साथ इधर-उधर अस्पतालों के चक्कर काटते रहे, लेकिन दो दिन तक किसी भी अस्पताल में बेड नहीं मिला। काफी मशक्कत के बाद गुरुवार रात बुजुर्ग को विवेकानंद अस्पताल में भर्ती किया गया, लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि लाने में बहुत देरी हुई। शुक्रवार सुबह बुजुर्ग की मौत हो गई।

परिजनों का आरोप है कि अस्पताल वालों ने यह कहकर भर्ती करने से मना कर दिया था कि पहले कोविड की रिपोर्ट लेकर आओ। सरकारी आदेश है कि जांच के नाम पर सिर्फ 700 रुपए लिया जा सकता है। मगर 15 सौ रुपए लिए गए। बावजूद इसके भर्ती करने में देरी गई है। मरीज को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। इसलिए परिजन तालकटोरा से पंद्रह हजार रुपए में प्राइवेट ऑक्सीजन सिलेंडर खरीदकर लाए थे। मृतक शुगर और बीपी से पीड़ित थे।

वहीं, पूर्व मंत्री भगवती सिंह की कोरोना से मौत के 12 दिन बाद उनके बेटे राकेश कुमार सिंह की भी मौत हो गई। बताया जा रहा है कि इलाज में देरी होने की वजह से राकेश सिंह की मौत हुई है। लोहिया अस्पताल में उन्हें भर्ती कराया गया था। वहीं, उनके भाई भी ऑक्सीजन सपोर्ट पर हैं।

शव की जांच में संक्रमित मिले थे पूर्व मंत्री
पूर्व मंत्री भगवती सिंह का 4 अप्रैल को निधन हुआ था। उनका शव जब KGMU को दान किया गया तो जांच में कोविड-19 पॉजिटिव पाया गया था। पूर्व मंत्री के संपर्क में आने से उनके दोनों बेटे राकेश कुमार और हृदयेश कुमार सिंह भी कोरोना संक्रमित हुए। शुक्रवार सुबह राकेश का निधन हो गया। वे 67 साल के थे। उनके दो बेटे और दो बेटियां हैं। रिवर बैंक कॉलोनी स्थित आवास पर उनका निधन हुआ है।

कंट्रोल रूम पर 60% निस्तारित नहीं पा रही हैं समस्या

लखनऊ में कोविड-19 कंट्रोल रूम पर कॉल करके लोग खुद को बचाने की मिन्नतें कर रहे हैं। कोई कह रहा है कि एंबुलेंस दिलवा दीजिए तो कोई भर्ती करवाने की डिमांड कर रहा है। किसी का आरोप है कि ऑक्सीजन सिलेंडर नहीं मिल रहा है। लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है। प्रतिदिन ऐसे करीब 2000 से ज्यादा कॉल केवल लखनऊ के लिए कोविड-19 सेंटर व नगर निगम और पुलिस हेल्पलाइन पर की जा रही हैं। लेकिन करीब 60% से ज्यादा लोगों की मदद नहीं हो पा रही है। स्थिति भयावह हो गई।

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