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ऐसा क्या है ‘सारण’ सीट में खास, जिसके लिए बागी हो गए तेजप्रताप ?

पिछले दिनों तेजप्रताप ने राजद से अलग होकर अपनी एक नयी पार्टी बनाने का घोषणा कर दिया जिससे राजनीति में खलबली मच गयी और माहौल में गहमागहमी छा गयी। लालू प्रसाद के बड़े बेटे तेजप्रताप ने सारण लोकसभा सीट को पारिवारिक सीट बताकर वहां अपनी माँ राबड़ी देवी को चुनाव लड़ने का आग्रह किया है। वो इस आग्रह को धमकी भरे अंदाज़ में बोले कि अगर इस सीट से उनकी माँ चुनाव लड़ने के लिए नहीं मानी तो वो खुद इस सीट से खड़े होकर निर्दलीय चुनाव मैदान में आएंगे।

आपको बता दें इस बार इस सीट से राजद की तरफ से तेजप्रताप के ससुर चन्द्रिका राय को टिकट दिया गया है। और इसलिए इसके बारे में ये भी बताया जा रहा है पारिवारिक लड़ाई की वजह से तेजप्रताप ने यह बात कही है। तेजप्रताप ने सारण सीट को पारिवारिक सीट बताकर अपनी माँ राबड़ी देवी को चुनाव लड़ने का आग्रह क्यों किया है, इसका वजह भी उन्होंने बताया है जो आपके लिए जानना आवश्यक है।

दरअसल जब 1957 में जब इस सीट पर पहली बार यहाँ चुनाव हुआ था तब इस सीट का नाम छपरा हुआ करता था और यही नाम साल 2009 तक चलता रहा। इस सीट का नाम 2008 में परिसीमन के बाद सारण कर दिया गया। जब 1975 में आपातकाल लागू होने के बाद 1977 में जब चुनाव हुए तो जनता पार्टी के टिकट पर लालू प्रसाद सफल होकर आये थे। वहीँ इस चुनाव के बाद राम शंकर प्रसाद कभी भी इस सीट पर अधिकार नहीं जमा सके। उनके हाथ से एक दफा जो ये सीट चली गयी तो दोबारा हासिल नहीं हो पायी। जनता दल का इस सीट पर इसके बाद काफी लम्बे वक़्त तक अधिकार जमा रहा।

वो साल 1996 था, जब पहली दफा भाजपा ने इस सीट पर अपना कब्ज़ा जमाया, और ये सब मुमकिन हो पाया था भाजपा के तरफ से जीत दिलाने वाले राजीव प्रताप रूडी के वजह से। राष्ट्रीय जनता दल के हीरा लाल राय ने 1998 के चुनाव में से ये सीट छीन ली, लेकिन 1999 में राजीव प्रताप रूडी फिर से जीत गए। राजद के अध्यक्ष लालू प्रसाद ने 2004 में लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करके इस सीट पर फिर से अपने पाले में कर लिया था, और इस सीट का 2009 में दोबारा से नाम सारण कर दिया गया। इस बार भी राजद की टिकट पर इस सीट से लालू यादव थे और वो फिर से जीत हासिल कर लिए। 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहार में भाजपा की ओर से राजीव प्रताप रूडी सारण सीट से जीत कर लोकसभा पहुँच गए।

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