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रानी पद्मिनी के जौहर के बाद क्या हुआ था ‘पापी’ खिलजी का, जानें इतिहास की अनसुनी कहानी

संजय लीला भंसाली की सबसे विवादित फिल्म बन चुकी ” पद्मावत ” में रानी पद्मिनी के जौहर की कहानी दिखाई गयी, जिसे लोगों ने बहुत पसंद किया। साथ ही इस कहानी ने लोगों के दिलों में इस घटना को लाकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या आखिर रानी पद्मावती के जौहर करने के बाद ही सारी कहानी ख़त्म हो गयी, उस पापी अलाउद्दीन का क्या हुआ, क्या उसे सजा मिली या नहीं |इन सब सवालों का जवाब आज हम आपको देने वाले है की आखिर रानी पद्मिनी के जौहर के बाद क्या हुआ था |

रानी पद्मिनी के जौहर के बाद अलाउद्दीन खिलजी के  साम्राज्य का परिचम चारो तरफ फेल रहा था .और उसी समय  सन 1299  में अलाउद्दीन की सेना ने गुजरात  राज्य  पर   एक आक्रमण किया था और वहाँ से बहुत सारा लूट पात कर के वापस दिल्ली ला रहे थे तभी सेनानायकों ने बीच  मार्ग में ही  लूट के धन के बँटवारे को लेकर विद्रोह कर दिया तथा वे विद्रोही सेनानायक राव हम्मीरदेव की शरण में रणथम्भौर चले गए  ये जो विद्रोही सेनानायक थे इनका नाम  मीर मुहम्मद शाह और कामरू थे जब  सुल्तान अलाउद्दीन ने इन विद्रोहियों को राजा राव हम्मीरदेव  से वापस  सौंप देने की माँग की  तब रणथंभोर के राजा राव हम्मीर ने उसकी इस  माँग ठुकरा दिया क्योंकि उन्होंने अपना|

क्षत्रिय धर्म के सिद्धान्तों पालन करते हुए  अपने शरण में आए हुए सैनिकों को सुल्तान खिजली को नहीं लौटाया उन्होंने अपने शरण में इन सैनिकों की  रक्षा करना ही अपना सर्वोच्च कर्त्तव्य समझा और उनके इस फैसले से  सुल्तान अलाउद्दीन  अत्यधिक क्रोधित होकर  रणथम्भौर के लिए ललकारने लगा

इस युद्ध के लिए अलाउद्दीन की सेना ने सर्वप्रथम छाणगढ़ पर आक्रमण किया उनका यहाँ आसानी से अधिकार हो गया और ये सुनकर हम्मीर ने रणथम्भौर से अपनी  सेना भेजी और इस चौहान सेना ने मुस्लिम सैनिकों को युद्ध में  परास्त कर दिया  और तब अपनी पराजय होने के बाद मुस्लिम सेना पराजित होकर वहाँ से भाग गई और उसके बाद चौहानों ने उनका लूटा हुआ धन व अस्त्र-शस्त्र लूट वापस से लूट लिए .|इसके बाद  वि॰सं॰ 1358 (ई.स. 130) में अलाउद्दीन खिलजी ने एक बार फिर से चौहानों पर आक्रमण किया और .छाणगढ़ में दोनों सेनाओं के बीच एक बहुत  भयंकर युद्ध हुआ लेकिन  इस युद्ध में हम्मीर स्वयं युद्ध में नहीं गया था इसके बावजूद भी वीर चौहानों ने वीरतापूर्वक युद्ध किया लेकिन विरोधी मुस्लिम सेना बहुत ही विशाल थी इसीलिए इनके सामने  ये ज्यादा देर तक नहीं टिक पाए और अन्त में सुल्तान का छाणगढ़ पर अधिकार हो गया .

तुर्की सेनानायकों ने हमीर देव के पास सूचना भिजवायी, कि हमें हमारे विद्रोहियों को सौंप दो, जिनको आपने शरण दे रखी है . हमारी सेना वापिस दिल्ली लौट जाएगी लेकिन हम्मीर अपने वचन पर दृढ़ थे उसने शरणागतों को सौंपने अथवा अपने राज्य से निर्वासित करने से स्पष्ट मना कर दिया और तत्पश्चात् मुस्लिम सेना रणथम्भौर की तरफ बढ़ने लगी और  तुर्की सेना ने रणथम्भौर पर घेरा डाल दिया . तुर्की सेना ने नुसरत खाँ और उलुग खाँ के नेतृत्व में रणथम्भौर पर आक्रमण किया मुस्लिम सेना का इस तरह घेरा बहुत दिनों तक चलता रहा लेकिन उनका रणथम्भौर पर अधिकार नहीं हो सका .

अलाउद्दीन ने राव हम्मीर के पास दुबारा दूत भेजा की हमें विद्रोही सैनिकों को सौंप दो, हमारी सेना वापस दिल्ली लौट जाएगी लेकिन हम्मीर हठ पूर्वक अपने वचन पर दृढ था हम्मीर के पास संधि का प्रस्ताव भेजा जिसको पाकर हम्मीर ने अपने आदमी सुल्तान के पास भेजे . उन आदमियों में एक सुर्जन कोठ्यारी  व कुछ सेना नायक थे . अलाउद्दीन ने उनको लोभ लालच देकर अपनी तरफ मिलाने का प्रयास किया इनमें से गुप्त रूप से कुछ लोग सुल्तान की तरफ हो गए |

दुर्ग का धेरा बहुत दिनों से चल रहा था, जिससे दूर्ग में रसद आदि की कमी हो गई . दुर्ग वालों ने अब अन्तिम निर्णायक युद्ध का विचार किया| राजपूतों ने केशरिया वस्त्र धारण करके शाका किया . राजपूत सेना ने दुर्ग के दरवाजे खोल दिए और भीषण युद्ध करना प्रारम्भ किया| दोनों पक्षों में आमने-सामने का युद्ध था एक ओर संख्या बल में बहुत कम राजपूत थे तो दूसरी ओर सुल्तान की कई गुणा बडी सेना, जिनके पास पर्येति युद्धादि सामग्री एवं रसद थी|

राजपूतों के पराक्रम के सामने मुसलमान सैनिक टिक नहीं सके वे भाग छूटे भागते हुए मुसलमान सैनिको के झण्डे राजपूतों ने छीन लिए व वापस राजपूत सेना दुर्ग की ओर लौट पड़ी . दुर्ग पर से रानियों ने मुसलमानों के झण्डो को दुर्गे की ओर आते देखकर समझा की राजपूत हार गए अतः उन्होंने जोहर कर अपने आपको अग्नि को समर्पित कर दिया किले में प्रवेश करने पर जौहर की लपटों को देखकर हमीर को अपनी भूल का ज्ञान हुआ . उसने प्रायश्चित करने के लिए उसी अग्नि में कूद गए.

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