उत्तर प्रदेशराजनीति

सब बात की एक बात : यूपी में तस्वीर साफ; सपा-बसपा को नहीं पसंद कांग्रेस का साथ !

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लखनऊ।  त्तर प्रदेश के दो प्रमुख दल समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने विपक्षी दलों की बैठक में शामिल नहीं होकर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से दूरी बनाये रखने का आज साफ सन्देश दे दिया। सपा और बसपा दोनों ही हाल ही में सम्पन्न छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के रवैये से नाखुश हैं दोनों कांग्रेस से गठबन्धन चाहते थे लेकिन कांग्रेस ने दोनों दलों से चुनावी समझौता नहीं किया। सपा के एक वरिष्ठ नेता ने स्पष्ट कहा कि लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी कांग्रेस से गठबन्धन नहीं करेगी। उनका साफ कहना था कि कांग्रेस से गठबन्धन कर उसे संजीवनी नहीं देनी है।

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उत्तर प्रदेश में कांग्रेस हाशिये पर है। इस राज्य में सपा ही भाजपा का विकल्प है। इसे बनाये रखने के लिये कांग्रेस से चुनावी राजनीति में दूरी बनाये रखना जरूरी है। बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती कांग्रेस से गठबन्धन के हमेशा खिलाफ रही हैं।हाल ही में सम्पन्न हुये विधानसभा चुनाव में गठबन्धन के मसले पर वह कांग्रेस के रवैये से नाखुश भी हैं। लोकसभा चुनाव में बसपा,कांग्रेस से समझौता नहीं करेगी। दिल्ली में विपक्षी दलों की बैठक में सपा और बसपा शामिल नहीं होकर इसका साफ सन्देश दे दिया। 

एक  राजनीतिक विश्लेषक और समाजसेवी का कहना है कि कांग्रेस ने मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सपा और बसपा से गठबन्धन नहीं किया तो वे उत्तर प्रदेश में उससे समझौता क्यों करेंगे। बहुत होगा तो दोनों दल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी के खिलाफ उम्मीदवार नहीं खड़ा करें। वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ चुकी सपा से विधान परिषद सदस्य और अखिलेश यादव के नजदीकी सुनील यादव कहते हैं कि राजनीति में परिस्थितियां बदलती रहती हैं। उस समय कांग्रेस से मिलकर चुनाव लड़ने की जरूरत महसूस की गयी थी तो मिलकर लड़ा गया लेकिन इस बार स्थिति अलग है।

कांग्रेस से गठबन्धन होगा या नहीं,इसका निर्णय तो अखिलेशजी ही लेंगे। सैद्धान्तिक रूप से यह तय कर लिया गया है कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से समझौता नहीं किया जाये। श्री यादव ने कहा कि जब कांग्रेस ने हाल ही में सम्पन्न विधानसभा चुनाव में सपा को साथ नहीं लिया तो अब चुनाव पूर्व उससे गठबन्धन का सवाल कहां पैदा होता है। उधर,लखनऊ के एक वरिष्ठ पत्रकार  कहते हैं कि कांग्रेस यदि सपा बसपा से अलग अकेले चुनाव लड़ती है तो इससे दोनों दलों का फायदा होगा क्योंकि कांग्रेस और भाजपा के ज्यादातर मतदाता सवर्ण ही हैं। सवर्ण मतों में बंटवारे का फायदा सपा और बसपा को होगा। आमतौर पर सपा को पिछड़ों और बसपा को दलितों की पार्टी मानी जाती है। दोनों का चुनावी तालमेल करना राजनीतिक मजबूरी है।

लोकसभा के 2014 में हुये चुनाव में बसपा को एक भी सीट हासिल नहीं हुई थी जबकि सपा को मात्र पांच सीटों पर जीत हुई थी। इन पांचों सीटों पर मुलायम सिंह यादव के परिवार वाले ही जीते थे,शेष उम्मीदवार चुनाव हार गये थे। लोकसभा में दोनों दलों को अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये मिलकर चुनाव लड़ना जरूरी है। यही मजबूरी उन्हें चुनावी राजनीति में और नजदीक ला रही है। वैसे भी, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव कह चुके हैं कि उनकी पार्टी का बसपा से गठबन्धन लगभग तय है। उत्तर प्रदेश में पिछड़ों और दलितों की आबादी करीब पचास फीसदी मानी जाती है। सपा बसपा के एक साथ आ जाने पर उनके गठबन्धन के साथ मुसलमान भी जा सकते हैं। इनके साथ आ जाने पर कांग्रेस की जरूरत रह ही नहीं जाती। शायद, इसीलिये दोनों दल दिल्ली में विपक्षी दलों की बैठक से अपने को अलग रखा।

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