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नेताओं को है अब सिर्फ देवताओं का सहारा? ऐसे तैयार करते हैं वोट बैंक

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चुनावी भहाभारत का शंखनाद हो चुका है  सभी राजनितिक पार्टियों जोरो से तरियारियो में जुटी हुई है, सभी पार्टी होने वाले इस चुनाव में कोई भी गलती नहीं करना चाहती। इस बीच चुनाव आयोग ने भी तारीखों की घोषणा कर दी है. प्रदेश में नेता और पार्टी, वो हर कदम उठा रहे हैं, जो उन्हें आगामी विधानसभा चुनावों में वोट दिलवा सके. वादों, विकास के गुणगान में अब लोक देवताओं की एंट्री भी हो चुकी है, जिनके माध्यम से नेता अपनी सियासी रोटियां सेंक रहे हैं.

दरअसल, राजस्थान में कई ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिन्हें आज भगवान के रूप में पूजा जाता है. ऐसा माना जाता है कि वे किसी भगवान के अवतार हैं और उनकी पूजा की जाती है. अब चुनावों में भी प्रदेश के नेता किसी विशेष जाति वर्ग के वोटर्स को लुभाने के लिए उनके वर्ग से जुड़े महापुरुषों का सहारा ले रहे हैं. वहीं स्थानीय विरोधी नेता भी अपने चुनाव में इनका सहारा लेते रहे हैं.

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हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अजमेर में अपने भाषण की शुरुआत क्षेत्रीय भाषा में की थी. जिसमें उन्होंने कहा था, ‘अठै ब्रह्मा स्वयं विराजे हैं, वीर तेजाजी री भूमि जठै, बठै सब लोग इत्ती घणी संख्या म पधार्या, या देख म्हारो जीव खूब सोरो हुयो, थां सबला न म्हारो घणो-घणो नमन… इस भाषण में भी उन्होंने लोकदेवता का जिक्र किया था.

राजस्थान सरकार ने भी प्रदेश के कई स्थानों पर इन लोकदेवताओं की जन्म-स्थली पर उनके पेनोरमा बनवाए हैं और भाषणों में भी इनका इस्तेमाल किया जा रहा है. रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार ने 300 करोड़ से ज्यादा खर्चा पेनौरमा बनवाने में किया है. हालांकि कहा जा रहा है कि शूरवीरों की गाथाओं को लोगों तक पहुंचाया जा रहा है. आइए, जानते हैं किस जाति के लिए कौन से लोक-देवता के सहारे नेता वोटर्स के दिल में उतरने की कोशिश कर रहे हैं.

तेजाजी- नागौर और आस-पास के अन्य क्षेत्रों में तेजाजी में आस्था रखने वाले लोगों को लेकर काफी कार्य किए गए. प्रदेश के जाट समुदाय के लोग तेजाजी में ज्यादा मान्यता रखते हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार नेता अपने चुनाव प्रचार में लोक देवताओं की बात जरूर करते हैं. बता दें कि तेजाजी का जन्म जाट वंश में हुआ था, जिसके आधार पर उन्हें जाटों का अराध्य देव कहा जाता है. माना जाता है कि जाट प्रदेश की 50 सीटों पर अहम भूमिका निभाते हैं.

वीर अमर सिंह राठौड़- राजस्थान में जाट और राजपूतों की राजनीति अलग-अलग चलती रही है. मारवाड़ में राजपूत समुदाय से अपना जुड़ाव रखने के लिए वीर अमर सिंह राठौड़ को याद किया जाता है. राजपूत समाज इन्हें आदर्श मानता है और हर साल नागौर में इनकी जयंती भी मनाई जाती है. सरकार ने भी इनकी जन्म स्थली पर खास काम किया है. बता दें कि अमरसिंह राठौड़ मारवाड़ के प्रसिद्ध राजपूत थे. उनकी वीरता के किस्से पूरे राजस्थान में सुनाए जाते हैं. वहीं राजपूतों की 12 सीट पर पकड़ है.

रामदेव जी- राजस्थान के लोकदेवताओं में रामदेव सबसे प्रमुख हैं और रामदेवरा (जैसलमेर) में इनका मंदिर है, जहां राजस्थान से ही नहीं गुजरात से भी लोग आते हैं. रामदेव जी भले ही राजपूत थे, लेकिन अनुसूचित जाति वर्ग के लिए किए गए उनके कार्यों के लिए दलितों में उनकी खास आस्था है. साथ ही रामदेव जी हिंदू और मुसलमान दोनों में ही समान रूप से लोकप्रिय हैं. कहा जाता है कि रामदेव जी ने मेघवाल जाति की डाली बाई को अपनी बहन बनाया था. सियासी तौर पर देखा जाए राज्य की करीब 60 सीटों पर एससी-एसटी वर्ग का दबदबा माना जाता है.

पाबू जी- पाबूजी को गायों, ऊंटों के देवता के रूप में मानते है. जोधपुर और इसके आस-पास के क्षेत्र में इनकी खास मान्यता है. कहा जाता है कि पाबू जी पहली बार अरब से ऊंट लेकर आए थे और गायों की रक्षा करते हुए ही उन्होंने अपने प्राण दे दिए थे. पाबू जी के माध्यम से राईका और रेबारी समुदाय के वोट हासिल करने की कोशिश हर नेता की रही है. बता दें कि राईका और रेबारी समुदाय का असर पाली, जालौर, सिरोही, जोधपुर की कई सीटों पर है. हाल ही में मुख्यमंत्री ने रात में कोलू पाबूजी ग्राम पंचायत मुख्यालय पर लोक देवता पाबूजी पैनोरमा और अश्व पर सवार पाबूजी महाराज की प्रतिमा का लोकार्पण किया था.

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