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कांग्रेसी मठाधीशों की उलटी गिनती चालू, 3 महीनों में पार्टी में वो होगा जो किसी ने नहीं सोचा

लोकसभा चुनावो में पार्टी की करारी हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा इस्तीफे की पेशकश किये जाने के बाद पार्टी के अंदर ख़ामोशी है. हालाँकि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को यह एकाधिकार दे दिया गया था कि वे संगठन में अपने मन मुताबिक फेरबदल करें. इसके बावजूद अभी भी राहुल गांधी अपना इस्तीफा देने पर अड़े हैं.

दस जनपथ के करीबी सूत्रों की मानें तो अगले तीन महीने कांग्रेस के लिए बेहद अहम होंगे. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने यदि अध्यक्ष पद से इस्तीफे की जिद्द छोड़ दी तो वे पार्टी की कायापलट का काम शुरू करेंगे. इस कायापलट में कई प्रदेशो में नेतृत्व परिवर्तन से लेकर प्रदेश के प्रभारियों के तौर पर नए चेहरों को ज़िम्मेदारी दी जा सकती है.

सूत्रों ने कहा कि मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्णाटक जैसे राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन किया जाना तय है. राजस्थान में विधानसभा चुनाव से पहले सचिन पायलट प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे लेकिन उपमुख्यमंत्री बनने के बाद भी अभी प्रदेश कांग्रेस की ज़िम्मेदारी सचिन पायलट ही देख रहे हैं. ठीक इसी तरह का हाल मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का है जहाँ प्रदेश अध्यक्ष पद पर मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पास है.

इसी तरह सूत्रों ने कहा कि हरियाणा में प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बीच चल रहे शीत युद्ध को समाप्त कराने के लिए राहुल गांधी राज्य में नए प्रदेश अध्यक्ष की न्युक्ति कर सकते हैं. जबकि उत्तर प्रदेश को लेकर सूत्रों ने कहा कि राजबब्बर अभी राज्यसभा सदस्य हैं और उनका कार्यकाल बाकी है. प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन कर किसी ब्राह्मण चेहरे को ज़िम्मेदारी दी जा सकती है. हालॉंकि सूत्रों ने कहा कि उत्तर प्रदेश के लिए प्रियंका भी एक सही विकल्प हैं.

सूत्रों ने बिहार और उत्तर प्रदेश में भी नेतृत्व परिवर्तन की सम्भावना जताते हुए कहा कि बिहार में कांग्रेस को फिर से खड़ा करने के लिए पार्टी प्रदेश की कमान किसी सीनियर नेता को सौंप सकती है. माना ये भी जा रहा है कि कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस के बीच बढ़ते टकराव को थामने के लिए भी राहुल गांधी कोई बड़ा कदम उठा सकते हैं जिससे जेडीएस और कांग्रेस के बीच लगातार हो रही बयानबाजियां रोकी जा सकें.

दरअसल बदली परिस्थितियों में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भविष्य में होने वाले विधानसभाओं को ध्यान में रखकर बड़े बदलाव कर सकते हैं. इस वर्ष हरियाणा, झारखंड, सिक्किम और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने हैं. वहीँ अगले वर्ष 2020 में दिल्ली विधानसभा के चुनाव होंगे. ऐसे में राहुल गांधी जो भी बदलाव करेंगे वे विधानसभा चुनावो को ध्यान में रखकर ही किये जाएंगे. इसी क्रम में राज्य के प्रभारी भी बदले जा सकते हैं.

इसके साथ ही विधानसभा चुनावो में बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए राहुल गांधी नए सिरे से क्षेत्रीय दलों से बातचीत शुरू करवा सकते हैं. झारखंड में कांग्रेस ने पहले ही कई दलों को मिलाकर महागठबंधन बना लिया है. महाराष्ट्र में एनसीपी के साथ गठबंधन होने के बावजूद उसे पराजय का सामना करना पड़ा. इस पराजय का कारण प्रकाश आंबेडकर की पार्टी को माना जा रहा है. लोकसभा चुनाव के दौरान प्रकाश आंबेडकर की पार्टी से गठबंधन को लेकर कांग्रेस-एनसीपी के बीच बातचीत हुई थी लेकिन अंत में गठबंधन नहीं हो सका. इसलिए संभावना है कि विधानसभा चुनावो में बीजेपी को रोकने के लिए कांग्रेस-एनसीपी प्रकाश आंबेडकर की पार्टी से पहले से बातचीत शुरू करे और चुनाव आते आते गठबंधन को लेकर सहमति बनाने की कोशिश की जाए.

सूत्रों की माने तो अब पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस वामपंथियों को छोड़कर ममता बनर्जी की पार्टी के साथ खड़ी हो सकती है. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और टीएमसी के बीच गठबंधन को लेकर बातचीत हुई थी लेकिन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी की ज़िद्द के चलते यह बातचीत पूरी नहीं हो सकी और कांग्रेस राज्य में अकेले चुनाव लड़ी. गौरतलब है कि अधीर रंजन चौधरी और ममता बनर्जी के बीच काफी वर्षो से छत्तीस का आंकड़ा है.

लेकिन ये सब अगले तीन महीनों की रूपरखा है. फिलहाल तो कांग्रेस नेताओं की पहली कोशिश राहुल गांधी को इस्तीफा न देने के लिए मनाना है. यदि राहुल गांधी के हाथ में पार्टी की कमान बनी रहती है तो निश्चित तौर पर कांग्रेस में बड़े बदलाव होंगे.

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