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मोदी-शाह की जोड़ी से मुक्त होगी बीजेपी, अब सिर्फ संघ की पसंद ही चलेगी

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह अब मोदी सरकार में आ गए हैं. गृह मंत्रालय का जिम्मा उनके पास है. अब सवाल ये है कि पार्टी कौन संभालेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि बीजपी में एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है. मतलब ये कि एक ही व्यक्ति दो पदों पर काम नहीं कर सकता है. 2014 में भी राजनाथ सिंह को इसी नीति के तहत पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा था. अब अमित शाह को भी इसीलिए पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ना है.

आज की बात करने से पहले हम आपको वक्त में थोड़ा पीछे ले चलते हैं. साल 2009, लोकसभा चुनाव से ठीक पहले मोहन भागवत ने आरएसएस की कमान संभाली थी. देश में लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका था. अटल बिहारी वाजपेयी अपने स्वास्थ्य की वजह से पूरी तरह से राजनीति से निष्क्रिय हो चुके थे और बीजेपी की राजनीति के पुरोधा माने जाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी निकल पड़े थे चुनावी अभियान पर. आडवाणी अपने साथ लगे पीएम इन वेटिंग के तमगे को पीएम में बदलना चाहते थे. इसलिए उन्होने चुनाव का मुद्दा बना डाला कमजोर पीएम मनमोहन सिंह बनाम लौह पुरूष आडवाणी. नतीजे आए और आडवाणी फिर पीएम इन वेटिंग ही रह गए.

ऐसे में कुछ ही महीने पहले संघ की कमान संभालने वाले मोहन भागवत आगे आए. साफ कर दिया कि बीजेपी को बदलना होगा, नया राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनना होगा, नए नेताओं को मौका देना होगा. भागवत ने यह भी साफ कर दिया कि नया राष्ट्रीय अध्यक्ष दिल्ली की चौकड़ी से बिल्कुल नहीं होगा, कतई नहीं होगा. दिल्ली में कुंडली मार कर बैठे बीजेपी नेताओं में कुलबुलाहट होने लगी तो फिर भागवत को 28 अगस्त 2009 को दिल्ली में प्रेस क्रांफ्रेंस कर यह कहना पड़ा कि वो संकोच नहीं लिहाज करते हैं और बिन मांगे सलाह नहीं देते. तलाश शुरू हुई नए अध्यक्ष की, और नजरें जाकर टिक गईं गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर पर, ताजपोशी की तैयारी शुरू ही हुई थी कि आडवाणी पर उनका एक विवादित बयान सामने आ गया.

आडवाणी ने तुरंत इस मौके को लपक कर वीटो लगा दिया लेकिन कमल को खिलाने के लिए तालाब का पानी बदलने पर अड़े संघ ने तलाश जारी रखी और इस बार उन्होंने चुना महाराष्ट्र के दिग्गज नेता नागपुर के नितिन गडकरी को. गडकरी ने पार्टी की कमान संभाली. उन्हें दोबारा अध्यक्ष बनाने के लिए बीजेपी ने अपने संविधान तक को बदल दिया, हालांकि गडकरी दोबारा अध्यक्ष नहीं बन पाए. संघ ने फिर से राजनाथ सिंह पर भरोसा किया, उन्हें पार्टी की कमान थमाई. लेकिन दिल्ली की चौकड़ी से खफा संघ तब तक यह भी तय कर चुका था कि 2014 का चुनाव नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ना है. मोदी दिल्ली आए, साथ में अमित शाह को भी लाए. 2014 का चुनाव जीता, सरकार बनाई और पार्टी की कमान अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगी अमित शाह को थमा दी. अब शाह सरकार में शामिल हो चुके हैं और एक बार फिर से बीजेपी के नए अध्यक्ष की तलाश शुरू हो गई है लेकिन बड़ा सवाल है– नया अध्यक्ष चुनेगा कौन ?

बीजेपी के अगले अध्यक्ष की रेस में सबसे आगे जे.पी. नड्डा को बताया जा रहा है. नड्डा मोदी की पिछली सरकार में कैबिनेट मंत्री थे लेकिन इस बार उन्हें सरकार में शामिल नहीं किया गया है और उसी के बाद से उनके अध्यक्ष बनने को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं. मोदी-शाह दोनों के भरोसेमंद नड्डा ने इस बार यूपी में सपा-बसपा गठबंधन के बावजूद एनडीए को 64 सीटें जिताकर अपनी रणनीति का लोहा तो मनवा ही लिया है. संगठनात्मक मामलों में मजबूत पकड़ रखने वाले नड्डा हिमाचल प्रदेश के ब्राह्मण समुदाय से आते हैं.

अध्यक्ष पद के दूसरे सबसे बड़े दावेदार पार्टी के महासचिव भूपेंद्र यादव बताए जा रहे हैं. अमित शाह के करीबी भूपेंद्र यादव ने यूपी विधानसभा जीत के समय महत्वपूर्ण भुमिका निभाई थी. इस बार के लोकसभा चुनाव में भी यादव ने गुजरात और बिहार में अमित शाह को निराश नहीं किया. कानूनी मामलों के जानकार भूपेंद्र यादव भी मोदी और शाह के करीबी माने जाते हैं. ओम माथुर का नाम भी इस पद के लिए चर्चा में है.

या बनेगा कोई और…बीजेपी में शीर्ष पदों को लेकर हमेशा चौंकाने वाले नाम आए हैं. संघ तो हमेशा से ही इसमें माहिर रहा है और नरेंद्र मोदी अमित शाह की जोड़ी ने भी कई बार यह साबित किया कि उनकी थाह ले पाना इतना भी आसान नहीं है. कहा तो यहां तक जा रहा है कि क्या पार्टी और सरकार दोनों को ही पूरी तरह से एक ही व्यक्ति के हाथ में संघ जाने देगा ? अगर इसका जवाब हां है तो फिर निश्चित तौर पर जे.पी. नड्डा और भूपेंद्र यादव इस रेस में सबसे आगे चल रहे हैं लेकिन अगर इसका जवाब ना है तो फिर हमें एक चौंकाने वाले नाम के लिए तैयार रहना चाहिए.

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