राजनीति

गोवा में गडकरी ने बिछाई ऐसी बिसात, फिर से कांग्रेस खा गई मात

गोवा को नया मुख्यमंत्री मिल गया है, प्रमोद सावंत ने सदन में बहुमत भी साबित कर दिया है, लेकिन बीजेपी के लिए ये सबकुछ उतना आसान भी नहीं था जितना दिख रहा है. दरअसल मनोहर पर्रिकर के निधन से पहले ही बीजेपी को अंदाज़ा था कि सीएम पद को लेकर घमासान मच सकता है, वहीं दूसरी तरफ सत्ता में साझीदारों के लिए ये मौका अपने लिए मुख्यमंत्री पद सुरक्षित कर लेने का था.

साल 2017 में जब बीजेपी बहुमत से दो कदम दूर थी तब नितिन गडकरी ने कांग्रेस के दिग्विजय सिंह को रणनीति बनाने में मात दी थी. इस बार फिर गडकरी गोवा पहुंचे. चुनौती सत्ता को बीजेपी के खूंटे से बांधे रखने की थी. जिस शाम मनोहर पर्रिकर ने आखिरी सांस ली उसी रात कांग्रेस सरकार बनाने की जुगत में लग गई लेकिन वहीं महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी और गोवा फॉरवर्ड पार्टी ने भी संभावनाएं टटोलनी शुरू कर दीं. ये दल पहल से सत्ता में हिस्सेदार थे लेकिन पर्रिकर की अनुपस्थिति में अपना हिस्सा बढ़ा लेना चाहते थे. एमजीपी ने सुदीन धवलिकर और जीएफपी ने विश्वजीत राणे को सीएम पद के लिए आगे करके गडकरी का संकट बढ़ा दिया. ऐसा नहीं कि बीजेपी को आनेवाली परिस्थिति का अनुमान नहीं था, लेकिन सच ये है कि पर्रिकर ही वो नेता थे जो इन सभी असंतुष्टों को मनाकर रखने की क्षमता रखते थे.

कांग्रेस को लगा कि बीजेपी बहुमत जुटाने में जब तक वक्त गंवाएगी वो राज्यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा पेश कर देगी. गोवा पर नज़र रखे हुए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने जब देखा कि गडकरी अकेले संकट से निपट नहीं सकेंगे तो उन्होंने अपने विधायकों और सहयोगी पार्टी के विधायकों के साथ होटल में बैठक की. बंद कमरे में सभी को तरह तरह का आश्वासन देने के बाद सहमति बन गई. नए फॉर्मूले के तहत बीजेपी ने संघ के दुलारे प्रमोद सावंत के नाम पर सहयोगियों की हरी झंडी ले ली. बदले में एमजीपी के सुदीन धवलिकर और जीवीपी के विजय सरदेसाई को डिप्टी सीएम बनाने पर रज़ामंदी बन गई.

इस तरह एक बार फिर कांग्रेस गोवा का दुर्ग फतह नहीं कर सकी और बीजेपी ने बड़े ही करीने से अपना दुर्गपति बदलकर भी सत्ता नहीं खोई.

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