दिल पर हाथ रखकर सोचिए.. आपको कॉमेडी के नाम पर क्या-क्या नहीं परोसा जा रहा है?

अपन हैं सख्त लौंडे!

ब्रो मुझे भी ये करना है!

You know his ***** is that big!

धत तेरी *******!

मुझे तेरा मुंह बिल्कुल पसंद नहीं आया! आ थू!

भाई एक बात बताओ, हंसी आती है क्या ऐसी कॉमेडी को सुनकर और अगर हां, तो आप बहुत ही बड़े बौड़म प्रसाद हो और ‘डपोरशंख झिंगालू शिरोमणि क्लब’ में आपका स्वागत है। भैया जी, हम भी ऐसा ही प्रयास करते हैं पर ‘शुक्लागंज’ के बजबजाते नाले की सौगंध, हमारे घटिया जोक्स पर आज तक हमारे विद्यालय की लड़की छोड़िए, एक लड़का तक नहीं हँसा। परंतु कुछ लोगों को हास्य और व्यंग्य के नाम पर मरकटों की भांति उछल कूद मचाते, गालियां देते और उछिद्र हरकतें देखता हूं तो लगता है भाई, मैं इतना भी बुरा नहीं हूं। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि कैसे कॉमेडी के नाम पर हमें अब कुछ भी परोसा जा रहा है और अब हास्य कला का स्तर बद से बदतर हो चुका है।

आज कॉमेडी को कॉमेडी कहें या कचरा, कहना कठिन है। अधपकी खिचड़ी कहना तो खिचड़ी का अपमान है परंतु इस बात को अनदेखा नहीं कर सकते कि विश्व की सबसे कठिन कलाओं में से एक का जिस तरह से चीर हरण किया जा रहा है। उसका कोई हिसाब नहीं है। वो कैसे? आज कॉमेडी के नाम पर या तो ऐसे चुटकुले सुनाये जाएंगे, जिनका वास्तविकता से दूर दूर तक कोई नाता नहीं है या फिर उनमें कूट कूट कर नौटंकी और एजेंडा भरा होगा। इस समस्या पर चर्चित अभिनेता, कॉमेडियन एवं लेखक रिकी जर्वेस ने प्रकाश डाला, जब उन्होंने एक शो में ये बोला।

 

इस क्लिप का अर्थ स्पष्ट था कि भाई इन लोगों के हिसाब से अल्पसंख्यकों का कोई सेंस ऑफ ह्यूमर नहीं हो सकता और जो लोग कथित रूप से शोषक हैं, वे भले स्वयं ही संख्या से अल्पसंख्यक क्यों न हो, उन्हें अपनी लड़ाई लड़ने का कोई अधिकार नहीं। यानी लोगों के लिए मनोरंजन बाद में आएगा, एजेंडा पहले आ जाएगा। यह अब केवल पाश्चात्य जगत तक सीमित नहीं है, इस विषबेल ने भारत में भी जड़ें जमा ली है। आज से कुछ वर्ष पहले तक क्या आपने कुशा कपिला, मुनव्वर फारूकी, कुणाल कामरा, समय रैना जैसे कॉमेडियन के बारे में सुना था? इनके उल्लेख मात्र पर आप आज भी खोपड़ी खुजाने लगेंगे – ये हैं कौन?

अब ये न तेंदुलकर हैं, जिन्होंने रनों का पहाड़ खड़ा किया है, न ही सूबेदार नीरज चोपड़ा हैं, जो भाला फेंक फेंक कर देश को गौरवान्वित करते हैं और न ही धीरुभाई अंबानी हैं, जिन्होंने उद्यमिता को एक नई उड़ान दी। इनके अगर आप जोक सुन लो तो भोलेनाथ की सौगंध, तेज प्रताप यादव आपको देव माणूस लगेगा! अगर एजेंडा एजेंडा ही करना है तो दिल्ली प्रेस क्लब है, खान मार्केट है, कुछ नहीं तो सुलभ शौचालय, सार्वजनिक मल विसर्जन है बंधुओं? और अभी तो हमने इनके परम प्रिय AIB ग्रुप पर चर्चा भी प्रारंभ नहीं की है, जिनके लिए तो गरुड़ पुराण में अलग दंड लिखे हुए हैं!

परंतु ये स्थिति आज से पूर्व तो थी नहीं? एक समय ऐसा भी होता था जब कलाकार वास्तव में लोगों को हँसाने के लिए प्रयास करते थे और उनके प्रयास में भरपूर परिश्रम होता था। अब सुरेन्द्र शर्मा को ही देख लीजिए, जिनकी कॉमेडी में जान होती है। जिन्हें सुनना काफी लोग पसंद करते हैं और फूहड़ एवं अश्लील कंटेंट कभी भी इनकी डिक्सनरी में नहीं रहे हैं। लेकिन सुरेन्द्र शर्मा इस सूची में अकेले नहीं हैं। महमूद जैसे हास्य कलाकार हो, चेतन सशीतल जैसे वॉइसओवर आर्टिस्ट हो या फिर राजू श्रीवास्तव, राजपाल यादव जैसे हास्य कलाकार, इनके चुटीले तंज ऐसे होते थे कि आज भी लोग न केवल इनके प्रशंसक हैं अपितु इनके अभिनय के लिए लालायित हैं। वैसे भी फिर हेरा फेरी के परम प्रिय कचरा सेठ को कैसे भूल सकते हैं?

तो फिर ऐसा क्या हुआ कि हास्य के इस मनोरम बगिया को किसी की कुदृष्टि लग गई? कुदृष्टि तो किसी की नहीं लगी परंतु बीमारी अवश्य लगी, जो संगीत का व्यवसायीकरण था। हास्य का भी अंधाधुंध व्यवसायीकरण होने लगा और इसका सबसे बड़ा उदाहरण था – कॉमेडी नाइट्स विद कपिल। द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज से निकलकर आए कपिल शर्मा ने अपने अनोखे शैली में लोगों को हँसाना प्रारंभ किया। फॉर्मेट भी ओरिजिनल नहीं था क्योंकि ये अंग्रेजी शो – द कुमार्स एट नंबर 42 की कॉपी था लेकिन लोग इसके पीछे हाथ धोकर पड़ गए। परंतु जब कलर्स को इनकी नौटंकी पसंद नहीं आई तो यह अपनी दुकान लेकर सोनी की ओर निकल पड़े और द कपिल शर्मा शो का पिटारा खोल लिया और फिर जो कॉमेडी की चीर फाड़ प्रारंभ हुई, उसका अब न आदि है न अंत!

आज हास्य कला का जो हाल आप देख रहे हैं, उसमें कुछ योगदान तो निस्संदेह वामपंथी कलाकार और काफी योगदान कपिल शर्मा जिसे निकृष्ट लोगों का है लेकिन अधिकतम योगदान व्यवसायीकरण की अंधाधुंध होड़ का है। परंतु क्या अब कोई आशा नहीं है? नहीं ऐसा भी नहीं है। अभिनय में यदि इरफान खान हमें छोड़ कर नहीं जाते तो वो तो थे ही, उनके अतिरिक्त अनुभव सिंह बस्सी जैसे कलाकार एवं मेक जोक ऑफ और द कोवर्ट इंडियन (जबकि ये कॉमेडी नहीं है) जैसे यूट्यूब चैनल सिद्ध करते हैं कि यदि मनोरंजन करना है तो बिना अपशब्द, बिना फूहड़ता के भी मनोरंजन संभव है। और जैसे सोनू भैया कहे थे कि “तरीका होता है, जिन्हें ख्याल रखना होता है, वे टॉन्ट मारकर नहीं कहते।”