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शादीशुदा की दीवानी हुई कुंवारी लड़की, कोर्ट ने सुनाया ऐसा फैसला कि खुशी से झूम उठी

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हर किसी लड़की का एक सपना होता है कि उसकी एक दिन शादी होगी! और वो दुल्हन बन कर अपने पिया के साथ ससुराल जायेगी! जंहा उसका एक परिवार होगा और वो हँसी -खुशी अपनी जिन्दगी जियेगी! और हर माँ -बाप का यह सपना होता है की वो अपनी बेटी की शादी धूम -धाम से करे! मगर इस मामले में सब कुछ अगल है. सच कहा है लोगो ने प्यार उम्र देख कर नहीं दिल देख कर किया जाता है. ऐसा ही कुछ यहाँ भी हुआ है.

बताते चले इस मामले में  राजस्‍थान हाई कोर्ट ने 26 साल की युवती को एक शादीशुदा मर्द के साथ रहने की इजाजत दी है। दोनों आपस में प्‍यार करते थे और प्रेमी ने कोर्ट में याचिका दायर की थी। शादीशुदा प्रेमी ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि महिला को उसके मां-बाप ने बंधक बना लिया है।

अंग्रेजी वेबसाइट की रिपोर्ट के मुताबिक

जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विनित कुमार माथुर की बेंच इस मामले की सुनावई कर रहे थे। याचिकाकर्ता मोइनुद्दीन अब्बासी ने कहा कि उन्होंने 28 जुलाई, 2018 को 26 साल की रूपल सोनी से शादी की थीऍ उन्होंने यह भी कहा कि सोनी के परिवार ने उन्हें बंधक बना कर रखा है।

विस्‍तार से जानिए पूरा मामला

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इस मामले में कोर्ट ने पुलिस को अदालत के समक्ष महिला को पेश करने का आदेश दिया था। बीते 13 मार्च को सोनी ने कोर्ट को कई अन्य बातें बताईं। सुनवाई के दौरान अदालत को यह बताया गया कि याचिकाकर्ता पहले से शादीशुदा है और उसके दो बच्चे हैं। बावजूद इसके उन्होंने सोनी से शादी कर ली। इसपर कोर्ट ने याचिका को निस्तारित करते हुए युवती को छूट दी, कि वह बालिग है और जहां जाना चाहती है, उसके लिए स्वतंत्र है।

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए

अदालत ने उस महिला को उदयपुर में सरकारी देखरेख में रखने को कहा था। कोर्ट ने आदेश दिया है कि “महिला याचिकाकर्ता के साथ अपने रिश्ते जारी रखना चाहती हैं। वो बालिग़ हैं और यह फ़ैसला अपने होश हवास में ले रही हैं। वो जहां चाहे रह सकती हैं।”

आपको बता दें कि इसी साल जनवरी माह में राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार की ओर से प्रेम विवाह करने वाले नव विवाहित दंपत्ति का संरक्षण करने की मंशा जताई थी। अदालत ने डीजीपी को कहा कि वे इस संबंध में गाइड लाइन तैयार कर अदालत में पेश करें। अदालत ने यह भी मंशा जताई की ऐसे नव दंपत्तियों की सहायता के लिए हर जिले में महिला आईपीएस अधिकारी की नियुक्ति होनी चाहिए। न्यायाधीश केएस अहलुवालिया की एकलपीठ ने यह आदेश बजरंगलाल की आपराधिक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया था।

 

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