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ब्रिटेन की इस महारानी को भारतीय नौकर से हुआ था प्यार, उससे ही कराती थी हर काम

आगरा के पंचकुइयां में स्थित कब्रिस्तान की एक कब्र कुछ समय पहले से लोगो के आकर्षण का केंद्र बन गया है. दरअसल ये कब्र महारानी विक्टोरिया के उस भारतीय प्रेमी की है, जो लंदन के राजमहल में महारानी का सबकुछ बन गया था, भरोशेमंद इंसान गुप्त प्रेमी और हिन्दुस्तान के मामलों का सलाहकार, और इनका नाम था मोहम्मद हफीज अब्दुल करीम.

यह बात आप नहीं जानते होंगे की करीम और विक्टोरिया के संबंधों को लेकर हॉलीवुड की फिल्म भी बनी जिसका नाम है, विक्टोरिया एंड अब्दुल. वैसे इतिहास में कभी भी अब्दुल के नाम का जिक्र नहीं है. अब्दुल का जिर्क ब्रिटैन के राजघरानों के एक दस्तावेज में सेवक के रूम में की गयी है. और इनके प्यार संभंधो का पता उस समय चला जब अब्दुल की डायरी सामने आयी थी. इस डेरी से यह भी पता चला की सेवक के रूप में ब्रिटेन गए अब्दुल करीम को किस तरह महारानी अपना दिल दे बैठीं थी.

हालांकि ब्रिटिश शासन ने अपनी पूरी कोशिश की कि क्वीन विक्टोरिया और उनके खास हिंदुस्तानी नौकर अब्दुल करीम की कहानी को छिपाकर रखा जाये. लेकिन यह बात तो सभी जानते है की सच्चाई कभी न कभी सामने आ ही जाती है. और जैसे ही यह किताब इतिहासकार शर्बानी बसु को मिली तो वह इसपर किताब लिखनी शुरू कर दी जिसका नाम विक्टोरिया एंड अब्दुलः द ट्रू स्टोरी ऑफ क्वींस क्लोजेस्ट कांफिडेंट है.

इनकी कहानी काफी फ़िल्मी है. भारत में ब्रितानी शासनकाल के समय में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ने 1887 में भारतीय नौकरों को एक समारोह के दौरान इंग्लैंड बुलाने का आदेश दिया था. आगरा के जेल सुपरिटेन्डेन्ट जॉन टाइलर ने कुछ भारतीयों को चुना, जिसमें 23 साल के असिस्टेंट क्लर्क अब्दुल करीम भी शामिल थे. चुने हुए लोगों में दो लोग को पानी के जहाज से 1887 में इंग्लैंड भेजा गया.

बकिंघम पैलेस पहुंचने के छह महीने भी नहीं हुए और करीम क्वीन के विश्वासपात्र बन गए, पहले दिन जब करीम समेत दोनों सेवक रानी के सामने पहुंचे तो करीम ने उनका ध्यान खींचा, यह भी कहा जा सकता है कि रानी को पहली ही नजर में यह पसंद आ गए थे. महारानी ने अपनी इस डायरी में पहले दिन की करीम से मुलाकात के बारे में भी लिखा था, और जो भी महारै से मिलने आता और करीम को देखता वह इनकी तारीफ के फूल बांधना शुरू कर देता था.

करीम क्वीन को हिन्दुस्तानी भाषा, खान-पान के बारे में बताने और शिखना शुरू कर दिया. जब करिम पूरी लगन के साथ महारानी को हिंदी सीखा रहे थे तो महारानी भी इनके लिए अंग्रेजी स्शिखाने का फिसला किया, करीम ने काफी तेजी के साथ अंग्रेजी सीखा और इस तेजी ने महारानी को ताज्जुब में दाल दिया. महारानी ने किताब में यह भी लिखा की यह बेहद तेज और बुद्धिमान है. और एक समय ऐसा आ गया की करीम को रहने के लिए ही अलग जगह दे डी गयी. इनका रुतबा इतना बढ़ गया कि क्वीन ने उन्हें सीवीओ का खिताब तक दे दिया, जिसे रॉयल विक्टोरियन ऑर्डर में ‘कमांडर’ का खिताब कहा जाता है.

बदलते समय के साथ वह धीरे-धीरे क्वीन के सचिव की तरह रखने लगे, महारानी भी उनसे उर्दू में पत्र-व्यवहार करने लगीं, और करीम को अलग घर रॉयल पैलेस ऑफ विंडसर, बालमोरल इन स्कॉटलैंड और ऑस्बॉर्न हाउस भी दे दिया गया था. महारानी अपनी हर यात्राओं में उन्हें अपने साथ रखती थीं. और यस सब देख इन दोनों के रिश्तों पर काफी चर्चा होनी शुरू हो गई, राजघराने मेंयह बात होने लगी कि अब्दुल करीम रानी के गुप्त प्रेमी बन चुके है, वह एकांत में उनके साथ समय गुजारना पसंद करती हैं.

बताया जाता है की लंबे कद और खूबसूरत दिखने वाले धनी अब्दुल करीम की शख्सियत और व्यवहार ऐसा था कि रानी न केवल उनसे प्रभावित होती गईं बल्कि उनके काफी ज्यादा करीब भी आ गयी. महारानी उनसे भारत से खतो-खिताबत कराने लगीं और इसी वजह से इनके नाम के आगे मुंशी जुड़ गया. ऐसा बताया जाता है की महारानी अक्सर अपने दिल की बातें उन्हें खत में लिखती थीं, और कभी कभी तो महारानी अपने पत्रों में चुंबन के प्रतीक भी बया करती थी, जो उस समय में बेहद असाधारण बात हुआ करती थी. इन दोनों के बीच का रिश्ता काफ़ी भावुक था, जिसका विभिन्न स्तर पर वर्णन आराम से किया जा सकता है.

इंग्लैंड में चर्चाओं के बाजार काफी गर्म हो चुके थे, राजघराने के लोगों ने आपत्ति उठानी शुरू कर दीं कि एक नौकर को इतना अहम क्यों बनाया जा रहा है. महारानी की बेटी और बेटे किंग एडवर्ड सप्तम भी इनसे खफा हो गए थे. उन्होंने विरोध में महारानी को पत्र लिखा की एक नौकर को क्यों इतना आगे बढ़ाया जा रहा है. फिर भी महारानी विक्टोरिया जब तक जीवित थी, अब्दुल करीम की हैसियत कम न हुई और सब वैसे ही चलता गया.

एक बार किसी समारोह में क्वीन को जाना था,और इस समाहरोह की मेजबानी प्रिंस अल्बर्ट एडवर्ड कर रहे थे, उन्होंने करीम के बैठने के लिए वो सीट बताई, जो नौकरों के लिए थी. रानी ने तुरंत उनके लिए घर के लोगों के साथ बैठने की व्यवस्था कराई, और जा इस बात पर इनके पुत्र ने नाराजगी जाहिर की तो महारानी ने तुरंत डांटकर उन्हें भी चुप करा दिया. इनकी डायरियों में लिखा है कि जब अब्दुल करीम महारानी के दरबार की नौकरी छोड़ने का मन बना बैठे थे, तब महारानी ने खुद उनसे न जाने की विनती की थी..

जब महारानी विक्टोरिया अब्दुल को पत्र लिखती थीं, तो हमेशा उसके आखिरी में तुम्हारी सबसे क़रीबी दोस्त लिखा करती थी. इस रिश्ता को एक जवान भारतीय आदमी और एक 60 वर्षीय महिला के बीच का एक रिश्ता था, जो अलग अलग स्तरों पर अलग तरह का था. इसमें सभी भूमिकाएं शामिल हो जाती थीं. शर्बानी की किताब कहती है कि विक्टोरिया और अब्दुल ने कम से कम एक रात साथ बिताई थी.

अब्दुल करीम की जीवनी लिखने वाली सुशीला आनंद के अनुसार, महारानी ने खुद के पत्रों में लिखा है कि उनके औऱ मुंशी के बीच बातचीत के विषय विस्तृत थे. महारानी के पत्रों में उनकी लगातार तारीफ की गयी है, और यह भी बताया की मई उसे काफी पसंद ही करती हु. वह बहुत अच्छा है साथ ही समझता है कि मैं क्या चाहती हूं और इससे मुझे वाकई काफी सहजता होती है.

महारानी की मृत्यु के बाद सन 1901 में किंग एडवर्ड उन्हें वापस भारत भेज दिया था. यही नहीं करीम और महारानी के बीच हुए पत्राचार को तुरंत जब्त करके नष्ट करने का आदेश भी दिया गया, करीम महारानी के साथ करीब 15 साल रहे थे. वह से वापस आने के बाद यह आगरा में अकेले रहने लगे. उन्होंने जहां अपने आखिरी साल बिताए, वह संपत्ति महारानी ने उन्हें दी थी, 1909 में जब अब्दुल का देहांत हुआ तब वह महज 46 वर्ष के थे.

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