उत्तर प्रदेश

UP में 2 से ज्यादा बच्चे वालों को नहीं मिलेंगे सरकारी योजनाओं के लाभ, लेकिन MP-राजस्थानन में ये कानून है फ्लॉप

उत्तर प्रदेश में दो महीनों के भीतर टू चाइल्ड पॉलिसी तैयार हो जाएगी। इसके लागू होते ही तीसरा बच्चा पैदा करने वालों को सब्सिडी, राशन वितरण, नौकरियों और दूसरी सरकारी योजनाओं में पहले की तरह फायदा नहीं मिलेगा। UP स्टेट लॉ कमीशन के चेयरमैन एएन मित्तल ने कहा कि जनसंख्या नियंत्रित करने के मकसद से ये कदम उठाया जा रहा है।

कानून बनाने के लिए UP लॉ कमीशन राजस्थान, मध्य प्रदेश, असम के साथ चीन और कनाडा के भी इसी तरह के कानूनों को स्टडी कर रहा है। हालांकि आंकड़े इसके उलट हैं। UP से पहले मध्य प्रदेश, राजस्‍थान, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्य ऐसी नीतियां ला चुके हैं, लेकिन इससे जनसंख्या नियंत्रण में कोई लाभ नहीं हुआ।

दो बच्चों की नीतियों वाले राज्यों में जनसंख्या 20% बढ़ी, जहां कानून नहीं था वहां भी औसत 20%

मध्य प्रदेश, राजस्‍थान, महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों में ये कानून साल 2000 से 2010 के बीच आए। इन सालों में इन सभी राज्यों में औसतन 20% की रफ्तार से जनसंख्या बढ़ी। अहम बात ये है कि उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों में भी औसतन 20% की रफ्तार से जनसंख्या में बढ़ोतरी हुई। यानी ऐसी नीतियों का राज्य की जनसंख्या पर कोई दिखने वाला फर्क नजर नहीं आया।

मध्य प्रदेश: यहां 2001 से दो बच्चों की नीति लागू है। मध्य प्रदेश सिविल सर्विस क्लॉज 4, नियम 22 के अनुसार, अगर तीसरा बच्चा 26 जनवरी 2001 के बाद पैदा हुआ है तो उस नागरिक को सरकारी नौकरी से वंचित रखा जाएगा। हालांकि इसके बाद भी 2001 से 2011 के बीच 20.35% जनसंख्या बढ़ी।

राजस्थानः यहां 2002 में राजस्थान सिविल सर्विसेज (पेंशन) रूल्स 1996, सेक्शन 53 (ए) लागू हुआ था। इसमें दो से ज्यादा बच्चों वाले नागरिक सरकारी नौकरी के लिए पात्र नहीं माने जाते थे। सरकारी बाबुओं को अगर तीसरा बच्चा होता था तो उन्हें समय से पहले रिटायरमेंट के लिए कहा जाता था। साल 2016 में नौकरियों में प्रमोशन से ये नियम हटाया गया था, लेकिन रिटायरमेंट वाले नियम पहले जैसे हैं।

महाराष्ट्र: महाराष्ट्र में सिविल सर्विसेज (डिक्लेरेशन ऑफ स्मॉल फैमिली) रूल्स 2005 के तहत दो से ज्यादा बच्चा पैदा करने वाले को राज्य सरकार की नौकरियों के लिए अपात्र माना जाता है। साथ ही महाराष्ट्र जिला परिषद और पंचायत समिति एक्ट के तहत दो से ज्यादा बच्चे वालों को लोकल बॉडी (ग्राम पंचायत और म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन) चुनाव लड़ने की छूट नहीं है।

गुजरात: 2005 में गुजरात सरकार ने लोकल अथॉरिटी एक्ट में बदलाव किया था। इसके बाद ऐसे लोग जिनके दो से ज्यादा बच्‍चे हैं, उन्हें स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से वंचित रखा जाता है।

उत्तराखंड: 2002 में उत्तराखंड की विधानसभा में ये बिल पास किया गया कि दो से ज्यादा बच्चे वाले नागरिक लोकल बॉडी चुनाव नहीं लड़ पाएंगे, लेकिन बाद में हाईकोर्ट ने ग्राम प्रधान के चुनाव लड़ने में छूट दे दी। हालांकि अब भी जिला पंचायत और ब्लॉक के चुनावों में ये नीति लागू है, लेकिन 2001 से 2011 के दौरान 18.81% की रफ्तार से जनसंख्या बढ़ी।

बिहार में भी ऐसे नियम थे, लेकिन 2020 में पंचायत चुनाव के वक्त दो बच्चों वाले कानून में ढील दी गई। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के पंचायत राज एक्ट 1994 के तहत वहां 30 मई 1994 से पहले किसी को तीसरा बच्चा हुआ हो तो उसे पंचायत चुनाव से बाहर कर दिया जाता है। ठीक यही नियम कनार्टक ग्राम स्वराज और पंचायत राज एक्ट 1993 में थे। ओडिशा में जिला परिषद एक्ट के तहत यही नियम है। असम में नौकरियों को लेकर दो बच्चों का नियम है।

UP में दो बच्चों के कानून को लेकर धर्मगुरुओं में भिड़ंत

सबसे पहले अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी का इस म़ुद्दे पर विवादित बयान आया। उन्होंने कहा, ‘जनसंख्या वृद्धि को कानून लाकर रोका नहीं गया तो आने वाले दिनों में देश में बड़ा जनसंख्या विस्फोट हो सकता है। देश में मुसलमानों की संख्या इतनी ज्यादा हो जाएगी कि हिंदुओं का रहना मुश्किल हो जाएगा। दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले माता-पिता का वोट देने का अधिकार खत्म कर देना चाहिए। ऐसे लोगों का वोटर कार्ड और आधार भी नहीं बनना चाहिए। जो दो से ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं, उन्हें सरकार से मिलने वाली सभी सुविधाओं से भी वंचित कर देना चाहिए।’

शलजीम उलमा-ए-इस्लाम के जनरल सेक्रेटरी मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि कौन कितने बच्चे पैदा करेगा, ये उसकी मर्जी है। अगर प्रदेश में जनसंख्या नियंत्रण कानून आता है तो इसका विरोध किया जाएगा। हां, अगर कानून को दायरे में रखते हुए बनाया गया तो इसका विरोध नहीं होगा।’

प्रति महिला बच्चा पैदा करने की दर UP में पहले से 2.74 है

जिस उत्तर प्रदेश में सरकार दो से ज्यादा बच्चा पैदा करने को लेकर नया कानून बनाने जा रही है, वहां पहले से ही प्रति महिला बच्चा पैदा करने की दर 2.74 ही है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2015-16 के अनुसार फिलहाल देश में बच्चा पैदा करने की राष्ट्रीय दर 2.2 है। साल 1992-93 में प्रति महिला बच्चा पैदा करने की दर 3.4 हुआ करती थी, जो स्वतः गिरती जा रही है। देश के प्रमुख 22 राज्यों में से 19 राज्य ऐसे हैं जहां प्रति महिला बच्चा पैदा करने की औसत दर 2.2 हो गई है। केवल बिहार एक ऐसा राज्य है, जहां अब भी प्रति महिला बच्चा पैदा करने की दर 3 से ज्यादा है।

चीन कम बच्चे पैदा करने की नीति से संकट में, अब कहने पर भी लोग अधिक बच्चे पैदा नहीं कर रहे

कम बच्चा पैदा करने और उसके नतीजों को लेकर सबसे ताजा उदाहरण पड़ोसी देश चीन का है। चीन सरकार ने 1979 में अपने यहां वन चाइल्ड पॉलिसी लागू की थी। नतीजतन 2010 में जहां कुल जनसंख्या में बुजुर्गों का शेयर 13.26% था वो 2020 में बढ़कर 18.7% हो गया। लिहाजा चीन में काम करने वाले युवाओं की संख्या घट गई। इसके चलते चीन ने 2016 में इस पॉलिसी को खत्म कर दिया, लेकिन अब भी चीन में बच्चा पैदा करने की दर 1 से आगे नहीं बढ़ पा रही है।

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