उत्तर प्रदेश

खत्म हुईं बीजेपी की तीनों धरोहर, अटल-आडवाणी और मुरली मनोहर

बीजेपी पूरी तरह बदल गई है. बदल गई है वो पार्टी जिसके लिए कहा जाता था कि भाजपा के तीन धरोहर, अटल, आडवाणी और मुरली मनोहर. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में इस युग का अंत हो चुका है. अटल रहे नहीं और इस बार आडवाणी और मुरली मनोहर को पार्टी से टिकट नहीं मिला.

दरअसल साल 2019 का लोकसभा चुनाव कई नए चेहरों के लिए शुरूआत है तो वहीं कई पुराने चेहरे यादों की धूल में दफन होने की ओर हैं. ऐसा ही एक चेहरा है मुरली मनोहर जोशी का. जोशी को ना तो इस बार उनकी पार्टी ने टिकट ही दिया और ना ही अब तक उनका नाम स्टार प्रचारकों की सूची में है. 2014 में कानपुर से जीतकर संसद पहुंचने वाले जोशी की जगह पार्टी ने सत्यदेव पचौरी को उम्मीदवार बनाया है.

मुरली मनोहर जोशी बीजेपी के कोई आम नेता नहीं रहे. पार्टी के जन्म से पहले, दौरान और बाद में उनकी भूमिका बेहद बड़ी रही है. उन्हें बीजेपी के इतिहास से अलग करके देखा ही नहीं जा सकता. 1944 में उनका संबंध संघ से जो बना तो वो आज तक कायम है. साल 1948 में गांधी हत्या के बाद संघ पर पहला प्रतिबंध लगा तो अनेक स्वयंसेवकों की तरह जोशी भी पुलिस के खिलाफ सड़क पर उतरे और गिरफ्तारी दी. अगले साल 1949 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के गठन में उन्होंने अहम हिस्सेदारी निभाई. इसी संगठन में साल 1953 में वो राष्ट्रीय महामंत्री भी बने.
1952 में जनसंघ की स्थापना में भी उनका रोल रहा. 1974 आया और इंदिरा शासन के खिलाफ ताल ठोकनेवालों में से वो भी एक बने. 19 महीने तक जोशी ने आपातकाल में जेल काटी. आपातकाल की रात खत्म हुई और उन्होंने अल्मोड़ा से चुनाव जीतकर पहली बार संसद में कदम रखा.

मुरली मनोहर जोशी को जनता पार्टी संसदीय दल का महासचिव नियुक्त किया गया तो उन्होंने अपने दायित्व को बढ़-चढ़कर निभाया. बीजेपी की स्थापना भी उन्हीं के सामने हुई. अटल और आडवाणी के बाद वो पार्टी के सबसे बड़े नेता के तौर पर उभरे. बुद्धिजीवी होने के साथ-साथ डॉ जोशी शानदार वक्ता और बेहतरीन संगठनकर्ता साबित हो रहे थे. 1996 में बीजेपी ने केंद्र मे सरकार बनाई और वो अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व मे देश के गृहमंत्री बने. 1998 में उन्होंने मानव संसाधन विकास मंत्रालय के साथ विज्ञान एवं तकनीकी तथा महासागर विकास मंत्रालय संभाला.

2014 आया लेकिन बीजेपी में मोदी युग के बाद भी जोशी अपना राजनीतिक करियर बचा पाने में कामयाब रहे थे उन्हें मोदी के लिए साल 2014 में वाराणसी सीट छोड़नी पड़ी थी लेकिन बदले में उन्हें कानपुर सीट मिली और वो जीते. इस बार उन्हें कानपुर से खड़े होने का मौका भी नहीं मिल सका. माना जा रहा है कि इस चुनाव के साथ ही उनकी पारी पर भी विराम लग जाएगा.

 

 

 

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