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मोदी सरकार में खामोशी से हुई इस 58वें मंत्री की एंट्री, और मजबूत हुआ देश का ‘शत्रु संहारक बल’ !

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत 30 मई, 2019 को दूसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में पद एवं गोपनीयता की शपथ ली। इसके साथ ही उन्होंने अपने मंत्रिमंडल में कुल 57 मंत्रियों को भी शामिल किया, जिन्होंने पीएम मोदी के साथ पद एवं गोपनीयता की शपथ ली। इस बात को आज चार दिन हो गए। सभी 57 मंत्री एक-एक कर कार्यभार संभाल रहे हैं, तो जो बाकी हैं, वो शीघ्र ही कार्यभार संभालने वाले हैं, परंतु इस बीच मोदी सरकार ने एक ऐसा बड़ा फैसला किया है, जिससे मंत्रिमंडल का विस्तार किए बिना ही टीम मोदी में 58वें मंत्री की एंट्री हो गई है।

आपको आश्चर्य हुआ ना ? परंतु यह सही है। टीम मोदी में जिस 58वें सदस्य की एंट्री हुई है, उसका नाम है अजित डोभाल। वास्तव में, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शासकीय तौर पर एक मजबूत मंत्रिमंडल का गठन करते हुए उसमें घरेलू-बाहरी शत्रुओं के संहारक बल में अमित शाह (गृह), राजनाथ सिंह (रक्षा) और एस. जयशंकर (विदेश) को शामिल किया, वहीं प्रशासकीय तौर पर भी प्रधानमंत्री मोदी ने इस शत्रु संहारक बल में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल को केबिनेट मंत्री का दर्जा देने का निर्णय किया है।

डोभाल पाँचवें NSA, पर मंत्री का दर्जा पहली बार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहली बार 26 मई, 2014 को देश की बागडोर संभालने के चौथे ही दिन यानी 30 मई, 2014 को भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के अधिकारी अजित डोभाल (AJIT DOVAL) को देश का पाँचवाँ एनएसए नियुक्त किया था। अब जबकि मोदी ने दोबारा सत्ता संभाली है, तब भी शपथ ग्रहण के चौथे दिन ही डोभाल को न केवल अगले पाँच वर्षों के लिए एनएसए बनाए रखने का निर्णय किया है, अपितु उन्हें केबिनेट मंत्री का दर्जा भी दिया है।

देश में एनएसए नियुक्त करने की परम्परा 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने शुरू की थी। ब्रिजेश मिश्रा देश के प्रथम एनएसए बने थे, जो नवम्बर-1998 से 22 मई, 2004 तक इस पद पर रहे थे। इसके बाद डॉ. मनमोहन सरकार के 10 वर्षों के कार्यकाल के दौरान जे. एन. दीक्षित, एम. के. नारायण और शिवशंकर मेनन एनएसए रहे, परंतु वाजपेयी या मनमोहन सरकार ने एनएसए को केबिनेट मंत्री का दर्जा नहीं दिया था। मोदी ने डोवाल को 2014 में पहली बार एनएसए बनाया और 2019 में अब केबिनेट का भी दर्जा दे दिया। पिछले पाँच वर्षों से चीन और पाकिस्तान की कारगुजारियों का कारगर रणनीति के साथ जवाब देने और सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, डोकलाम विवाद, अभिनंदन वर्तमान की वापसी तक के घटनाक्रों में महत्वपूर्ण भूमिका बजाने वाले डोभाल का डंका अब अगले पाँच वर्षों में और ज़ोरों से बजेगा।

पाकिस्तान नहीं पहचान सका, मोदी ने पहचान लिया

1968 की केरल बेच के आईपीएस अधिकारी डोभाल एक ऐसे भारतीय हैं, जो खुलेआम पाकिस्तान को बलूचिस्तान छीन लेने की चेतावनी देते हैं। डोभाल एक ऐसे जासूस हैं, जो 7 साल मुसलमान बन कर पाकिस्तान में रहे, परंतु पाकिस्तान पहचान न सका। वे एकमात्र ऐसे भारतीय हैं, जिन्हें शांतिकाल में दिया जाने वाला दूसरा सबसे बड़ा पुरस्कार कीर्ति चक्र दिया गया। 1972 में ही भारतीय गुप्तचर एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी-IB) जॉइन कर लेने वाले डोभाल के किस्सों के आगे जेम्स बॉण्ड फीके पड़ जाते हैं।

देश में सिख आतंकवाद पर नकेस कसने के लिए डोभाल ने पाकिस्तान में मुस्लिम जासूस बन कर खालिस्तानियों की जासूसी की, जिसके बूते पंजाब के अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में सफल ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार हो सका। कंधार विमान अपहरण कांड में डोभाल मुख्य वार्ताकार रहे। कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवाद को शांत करने में डोभाल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने 1991 में खालिस्तान लिबरेशन फ्रंट द्वारा अपहृत रोमानियाई राजनयिक लिविउ राडू को बचा कर भारत की प्रतिष्ठा बचाई, तो म्यानमार में छिपे भारत विरोधी उग्रवादियों पर सर्जिकल स्ट्राइक की सफल निगरानी की।

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