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हाशिमपुरा नरसंहार कांड : सभी आरोपियों को 30 साल बाद आजीवन कारावास

1987 में हुए हाशिमपुरा नरसंहार कांड के सभी आरोपियों को 30 साल बाद उम्रकैद

मेरठ. दिल्ली HC  ने 1987 के नरसंहार कांड मामले  में 6 पुलिसकर्मियों को हत्या और अन्य अपराधों के आरोपों से बरी करने के निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बुधवार को फैसला सुनाया। वर्ष 1987 के हाशिमपुरा सामूहिक हत्याकांड में सत्र अदालत द्वारा सभी 16 प्रोविंशियल आम्र्ड कॉन्सटैब्यूलरी (पीएसी) अधिकारियों को बरी किए जाने के फैसले को आज दिल्ली हाईकोर्ट ने पलट दिया है. हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को दोषी करार देकर उम्रकैद की सज़ा सुनाई है.

हाई कोर्ट ने कहा कि पीड़ितों के परिवारों को न्याय के लिए 31 वर्ष इंतजार करना पड़ा और आर्थिक मदद उनके नुकसान की भरपाई नहीं कर सकती। कोर्ट ने ये भी टिप्पणी की कि अल्पसंख्यक समुदाय के 42 लोगों का नरसंहार ‘लक्षित हत्या’ थी।

मार्च 2015 को निचली अदालत ने संदेश का लाभ देते हुए पीएसी के 16 पुलिसकर्मियों को 42 लोगों की हत्या के मामले में बरी कर दिया था। अदालत ने कहा था कि यह तो साबित होता है कि हाशिमपुरा से 40 से 45 लोगों का पीएसी के ट्रक से अपहरण किया गया और उन्हें मारकर नदी में फेंक दिया गया। अदालत के मुताबिक, यह साबित नहीं हो पाया कि इस हत्याकांड में पीएसी कर्मी शामिल थे।

अदालत ने कहा था कि 42 लोगों की हत्या के मामले में आरोपितों की पहचान के लिए बचाव पक्ष पर्याप्त सुबूत नहीं पेश कर सका। बाद में पीड़ितों की याचिका पर सितंबर 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले को दिल्ली हाई कोर्ट को ट्रांसफर किया था। इस जनसंहार में 42 लोगों को मृत घोषित किया गया था। इस घटना में पांच लोग जिंदा बच गए थे, जिन्हें अभियोजन पक्ष ने गवाह बनाया था।पीड़ित परिवारों ने इसके लिए सीधे तौर पर केंद्र और राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया था।

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