धर्म

स्कन्द षष्ठी पर्व : कब है और क्या है इस व्रत का महत्व ?

‘स्कन्द षष्ठी’ के व्रत में शिव पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय का पूजन किया जाता है। इस दिन कार्तिकेय जी की पूजा करने से रोग, दोष, दुःख और दरिद्रता का निवारण होता है। पर्व हिन्दू महिना कार्तिक में  कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। जो इस बार 30 अक्टूबर 2018 को मनाया जाएगा स्कन्द देव कार्तिकेय की पूजा मुख्यरूप से भारत के दक्षिणी राज्यों में और विशेषकर तमिलनाडु में होती है। स्कन्द देव भगवान कार्तिकेय का सबसे प्रसिद्ध मंदिर तमिलनाडू में ही स्थित हैं भगवान स्कन्द षष्ठी का व्रत कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को किया जाता है। इस व्रत को ‘संतान षष्ठी’ नाम से भी जाना जाता है। स्कंदपुराण के नारद-नारायण संवाद में संतान प्राप्ति और संतान से सम्बंधित दोष या दुःख,पीड़ा को हरने वाले इस व्रत का पूर्णविधान बताया गया है। एक दिन पहले से उपवास करके षष्ठी को ‘कुमार’ अर्थात् कार्तिकेय देव की पूजा की जाती है स्कंद षष्ठी के संबंध में ये मान्यता है कि स्कंद षष्ठी की उपासना से च्यवन ऋषि को नेत्रों की ज्योति प्राप्त हुई थीऔर ब्रह्मवैवर्तपुराण में ये भी बताया गया है कि स्कंद षष्ठी की कृपा से प्रियव्रत का मृत शिशु जीवित हो जाता है।

यह व्रत एक पौराणिक परंपरा है
स्कन्द षष्ठी की पूजा एक पौरांणिक परम्परा है। महादेव शिव के तेज से प्रगट बालक स्कन्द अर्थार्त भगवान कार्तिकेय की छह कृतिकाओं ने स्तनपान करके रक्षा की थी। और इनके छह मुख हैं जिस कारण उन्हें ‘कार्तिकेय’ नाम से पुकारा जाने लगा। समस्त पुराण व उपनिषदों में इनकी महिमा अंकित की गई है। सभी देवों के द्वारा स्कन्द देव को सेनानायक बनाया गया तब इन्होने तारकासुर का वध किया था| स्कन्द देव की पूजा, दीपों, वस्त्रों, अलंकरणों,खिलौनों के रूप में मुर्गों से की जाती है अथवा उनकी पूजा संतान के उत्तम स्वास्थ्य के लिए सभी शुक्ल षष्ठि तिथियों पर करनी चाहिए। वैसे तो यह व्रत प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को किया जाता है। वर्ष के किसी भी मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को यह व्रत आरंभ किया जा सकता है। और चैत्र अथवा आश्विन मास की षष्ठी को इस व्रत को आरंभ करने का प्रमुख प्रचलन है।

स्कन्द देव की पूजा में लगने वाली आवश्यक सामग्री
काले कसोठी रूप में भगवान शालिग्राम जी का विग्रह, कार्तिकेय देव जी का चित्र, तुलसी का पौधा गमले में लगा हुआ, 1 तांबे का लोटा, 1 नारियल, अन्य पूजा की सामग्री, जैसे- कुंकुम, अक्षत, हल्दी, पीला चंदन, अबीर, गुलाल, दीपक, घी, इत्र, पुष्प, दूध, जल, ऋतू फल, मेवा, मौली, शुद्ध आसन इत्यादि। यह व्रत विधिपूर्वक करने से निसंतान दंपत्ति को सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है। संतान को किसी प्रकार का कष्ट या रोग हो तो इस व्रत को करने से रक्षा करता है। स्कंद षष्ठी के अवसर पर शिव-पार्वती के साथ स्कंद देव कार्तिकेय की स्थापना कर पूजा की जाती है तथा अखंड दीप जलाया जाता हैं। स्कन्द देव भगवान कार्तिकेय को स्नान कराया जाता है, नए वस्त्र पहनाये जाते हैं और उनकी पूजा की जाती है। इस दिन भगवान को अनेक प्रकार के भोग लगाते हैं, किसी विशेष कार्य की सिद्धि के लिये इस दिन कि गई पूजा विशेष फलदायी होती है। इस दिन साधक तंत्र-मन्त्र साधना भी करते हैं, इस दिन मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन आदि का त्याग किया जाता है और ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक होता है।

स्कन्द षष्ठी का महत्त्व
भगवान स्कन्द शक्ति के अधिदेव हैं, और ये देवताओं के सेनानायक सेनापति हैं। मयूर पर आसीन देवों सेनापति कुमार कार्तिक की आराधना दक्षिण भारत मे सबसे अधिक होती है, दक्षिण भारत में स्कन्द देव ‘मुरुगन’ नाम से विख्यात हैं। मानप्रतिष्ठा, विजय, व्यवस्था, अनुशासन सभी कुछ स्कन्द देव की कृपा से सम्पन्न होते हैं। स्कन्दपुराण के मुख्य मूल उपदेष्टा कुमार कार्तिकेय ही हैं और स्कन्द पुराण सभी पुराणों में सबसे विशाल है। स्कंद देव भगवान कार्तिकेय हिंदू धर्म के प्रमुख देवों मे से एक हैं। स्कन्द देव को कार्तिकेय,कुमार और मुरुगन नामों से भी पुकारा जाता है। स्कन्द देव दक्षिण भारत में पूजे जाने वाले प्रमुख देवताओं में से एक महादेव शिव,पार्वती के पुत्र ही हैं। भगवान् कार्तिकेय के अधिकतम भक्त तमिल हिन्दू हैं। इनकी पूजा मुख्यत: भारत के दक्षिणी राज्यों और विशेषकर तमिलनाडु में होती है। भगवान स्कंद के सबसे प्रसिद्ध मंदिर तमिलनाडू में ही स्थित हैं।

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