उत्तर प्रदेशराजनीति

मुहम्मदाबाद विधान सभा सीट पर सपा से राजेश राय की दहाड़, अंसारी बंधुओ को देंगे चुनौती

  • करईल के माटी के शेर राजेश राय अपने दम पर देंंगे अंसारी बंधुओ को चुनौती
  • सपा से 2012 में 60 हजार वोट पाकर भी हार गए थे राजेश
  • कांग्रेस की झोली में सीट जाने पर वीरेंद्र का किया था प्रचार
  • भाजपा लहर के बाद भी राजेश राय ने वीरेंद्र को जिताया था
  • 2022 के विस चुनाव में अखिलेश के कहने पर की दावेदारी

गाजीपुर जनपद के करईल की माटी में पले बढ़े एवं प्योर खांटी समाजवादी राजेश राय पप्पू ने एक बार फिर मुहम्मदाबाद से अंसारी बंधुओं के खिलाफ सियासी अखाड़े में दहाड़ लगाई है। उन्होंने सपा से उम्मीदवारी के लिए आवेदन करने से पहले सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से बात की। तब उन्होंने आवेदन किया। सातों विधानसभा सीट पर वीरेंद्र, सुभाष पासी के बाद अगर सीट पक्की है तो राजेश राय की। अगर इस बार सपा उनको अपना उम्मीदवार घोषित करती है तो राय का जीतना पूरी तरह से तय माना जाएगा। क्योंकि अभी से भूमिहार लाबी राजेश की तरफ आशा भरी नजरों से देख रही है।

मुहम्मदाबाद तहसील के बाराचंवर ब्लाक के लट्ठूडीह गांव निवासी राजेश राय पप्पू को पहली बार जब समाजवादी पार्टी बनी तो मुलायम के सियासी गुरू रामकरन दादा ने उन्हें दस रूपये में सपा का सक्रिय सदस्य बनाया था। वर्ष 2012 में सपा से चुनाव हारने के बाद भी राजेश राय ने सियासी चोला नहीं बदला। वह सपा में बने रहे और लगातार समाजवादी झंडे को ऊंचा करते रहे। कई बार पार्टी के कोषाध्यक्ष रहे राजेश राय मुहम्मदाबाद के भूमिहारों में आज भी एक सियासी लकीर खींच चुके हैं। जब भाजपा को रोकने के लिए वर्ष 2017 में सपा ने कांग्रेस से समझौता किया तो मुहम्मदाबाद की सीट कांग्रेस की झोली में चली गई और जनक कुशवाहा जब चुनाव लड़े तो उन्हें 9 हजार वोट मिला। इधर अखिलेश के निर्देश पर राजेश राय जंगीपुर चले गए और डा.वीरेंद्र यादव के पक्ष में सवर्णों को जमकर लामबंद किया।

प्रचार एवं लामबंद करने का ही नतीजा रहा कि भाजपा लहर के बाद भी डा.वीरेंद्र चुनाव जीतने में सफल रहे। इधर मुहम्मदाबाद में भूमिहार अंसारी बंधुओं के खिलाफ एकजुट हुए और सभी ने मिलकर अलका राय को विधायकी का ताज सौंप दिया। अलका राय की जीत में अप्रत्यक्ष रूप से राजेश राय की भी बड़ी भूमिका रही। ऐसे ही नहीं यदुवंशियों ने अंसारी बंधुओं का गणित बिगाड़ा और अलका राय को कुर्सी सौंप दी। इसमें कहीं न कहीं राजेश की भी सियासी चाल रही। यही वजह रही कि सियासी विरोध के बावजूद आज भी एलजी की नजर में राजेश राय महत्वपूर्ण हैं।

सियासी वजहों से आज भी कभी न कभी राजेश के मोबाइल पर एलजी के फोन की घंटी घनघनाने लगती है। खैर छोड़िए अगर अंसारी बंधु सपा में नहीं आए तो राजेश को भूमिहारों के साथ ही यदुवंशी प्रदेश के सबसे बड़े सदन में पहुंचाने में अपनी पूरी ताकत झोंक देंगे। मौजूदा सियासी दौर में कुछ परिस्थितियों के कारण विधायक के परिवार से जमीन थोड़ी खिसकी है। यही कारण है कि मुहम्मदाबाद में राजेश राय की डिमांड ने सियासी जादूगरों को हैरान कर दिया है। यह डिमांड सियासत में बड़ा गुल खिला सकती है।

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