उत्तर प्रदेश

मायावती ने खुलेआम बना ली दूरी, आखिर अखिलेश की ऐसी क्या मजबूरी ?

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सोमवार को ही आजमगढ़ में गठबंधन के आगे बने रहने का संकेत दिया। वहीं, दिल्ली में बसपा प्रमुख ने यादवों पर धोखा देने का आरोप लगाते हुए उप चुनाव में एक मैदान में उतरने के लिए पदाधिकारियों को तैयारी करने की घोषणा कर दी। उनके बातों में दम भी है, क्योंकि गठबंधन के बाद बसपा को वोट 2014 की अपेक्षा .34 प्रतिशत कम ही हुआ है। भले ही पार्टी शून्य की अपेक्षा दस सीटों को जीतने में कामयाब हो गयी है। हालांकि सपा के वोट में पिछली बार की अपेक्षा 4.24 प्रतिशत की गिरावट आयी है।

सपा और बसपा के मतों पर गौर करें तो लोकसभा चुनाव 2014 में सपा को 22.20 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि बसपा को 19.60 प्रतिशत वोट मिले थे। 2009 के लोकसभा चुनाव की अपेक्षा सपा के 1.60 प्रतिशत कम वोट मिले थे, जबकि बसपा को 7.82 प्रतिशत वोट कम मिले। 2019 के चुनाव में सपा और बसपा ने जब मिलकर चुनाव लड़ा तो सपा को 17.96 प्रतिशत वोट मिले और 2014 की अपेक्षा 4.24 प्रतिशत वोट कम हो गये और बसपा के वोट प्रतिशत में मामूली गिरावट आयी।

अखिलेश पहले गठबंधन तोड़ने का नहीं दिखा पाये साहस

बढ़ने के बजाय सपा के वोट बैंक में भारी गिरावट के बावजूद सपा अध्यक्ष ने अभी कुछ दिन पहले हुई समीक्षा में गठबंधन तोड़ने का साहस नहीं दिखा पाये। अभी सोमवार को ही आजमगढ़ की सभा में उन्होंने कहा ‘हम विपक्ष की ताकत से मिलकर लड़ेंगे और उनके मजबूत रहते हुए भी हम उन्हें मात देंगे।’ उसी समय दिल्ली में बसपा प्रमुख मायावती ने पदाधिकारियों के साथ बैठक में मिले चुनावी इनपुट के बाद यादव बिरादरी का वोट बसपा में शिफ्ट न होने का आरोप लगा दिया। इसके साथ ही उन्होंने बसपा पदाधिकारियों से कहा कि आप लोग उप चुनाव की तैयारी करें और उसमें अपने दम पर बसपा चुनाव लड़ेगी।

मायावती अपने समर्थकों को खुश करने में रहीं सफल
इस संबंध में राजनीतिक विश्लेषक हर्ष वर्धन त्रिपाठी ने कहा कि यह तो होना ही था। हालांकि इसमें बसपा ने पहले गठबंधन तोड़ने का निर्णय लेकर अपने समर्थकों को बहुत हद तक खुश करने में सफल हो गयीं। आजमगढ़ में सोमवार को ही अखिलेश यादव गठबंधन के पक्ष में बयान देकर अब यह भी बहाना नहीं बना सकते कि वे भी गठबंधन तोड़ने पर विचार कर रहे थे। इससे सपा की छवि धूमिल होगी।

यह तो हाेना ही था
इस संबंध में हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता भारतेंदू पाठक का कहना है कि मायावती का गठबंधन जब भाजपा के साथ नहीं चल पाया तो फिर सपा के साथ कैसे चल सकता है। यह ताे दोनों दलों के समर्थक भी जानते थे कि यह होना ही है। दोनों की विचारधारा बिल्कुल विपरित है। मायावती ने पहले ही घोषणा कर राजनीति को अपने पाले में कर लिया।

Back to top button