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बदलते दौर की बदलती कहानी, औरतों को इन खिलौनों में मिला नया साथी!

वह घर के ड्राइंग रूम में खड़ी है। सामने सोफे पर हैं उसके पति और उसकी सासु मां। पति को चोट लगी है और वह उनके लिए पानी का गिलास लेकर आई है। पास में दादी सास टीवी देख रही हैं। टीवी का वॉल्यूम कंट्रोल करने के लिए वह रिमोट का बटन दबाए चली जा रही हैं। एक तरफ टीवी पर ‘कभी खुशी कभी गम…’ बज रहा है, तो दूसरी तरफ पूरा घर बहू की सिसकारियों से गूंज रहा है। चरमसुख पर पहुंचने के बाद जब वह थमती है, तब तक घर में तूफान खड़ा हो चुका होता है।

यह सीन है एक फिल्म का। दरअसल, दोपहर के खाली वक्त में, बहू खुद को यौन संतुष्टि देने में तल्लीन थी। उसका साथी था एक वाइब्रेटर। पति आया तो उसे अचानक से कमरे से बाहर आना पड़ा। इस हड़बड़ी में वाइब्रेटर का रिमोट उसने गलत जगह पर रख दिया, जिसे कमजोर नजरों वाली दादी सास ने टीवी का रिमोट समझकर अंधाधुंध दबाना शुरू कर दिया और यह सारा कांड हो गया।

वाइब्रेटर यानी एक सेक्स टॉय। जहां कुछ साल पहले तक सेक्स पर ही बात करना मुश्किल था, वहां अब उसमें खिलौना भी आ गया! जी हां, जमाना बदल रहा है। हाल में हुए एक सर्वे में सामने आया है कि भारतीय महिलाओं में सेक्स टॉय खरीदने का ट्रेंड बढ़ रहा है। लॉकडाउन के बाद इसकी बिक्री में करीब 65 फीसदी का इजाफा देखा गया है। पार्टनर से कोरोना इन्फेक्शन का खतरा हो सकता है, लेकिन सेक्स टॉय के साथ ऐसा कोई जोखिम नहीं है। क्या सेक्स टॉय की मांग बढ़ने की वजह यही है? सर्वे में तो ऐसे ही संकेत मिले हैं।

फिंगर वाइब्रेटर, हैंड्स-फ्री वाइब्रेटर, थ्रस्टिंग डिल्डोज, स्ट्रैप-ऑन डिल्डोज, डबल एंडेड डिल्डोज- इस तरह के न जाने कितने सेक्स टॉयज का बाजार इन दिनों गर्म है। मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, चंडीगढ़, दिल्ली, चेन्नई जैसे शहरों में बढ़ती मांग के चलते सेक्स टॉय के दामों में भी इजाफा हो रहा है।

एक वक्त था जब सेक्स पर बात करने को भी शर्मिंदगी का सबब माना जाता था। खासकर कोई औरत अपने सेक्शुअल प्रेफरेन्स की बात करे, अपनी जिस्मानी जरूरतों की बात करे, यह तो सोच से ही परे था। अगर कभी कोई मुंह खोले भी, तो तुरंत ही पूरा समाज हंगामा खड़ा कर देता। मानो अपनी जिस्मानी चाहतों या पसंद-नापसंद के बारे में बात करना कोई नाक़ाबिले माफी गुनाह हो।

लेकिन बाकी चीजों की तरह इस मामले में भी हमारे देश में नई क्रांति आ गई है। ‘फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे’। याद आया ना वह रेड रूम? जहां सेक्स में केवल दो जिस्म नहीं, बल्कि पता नहीं क्या-क्या साजो-सामान शामिल था। 365 डेज की नायिका याद है? बॉयफ्रेंड के साथ अनबुझी रह गई प्यास मिटाने के लिए सेक्स टॉय ही उसका सहारा थे। लेकिन, हमारे यहां लड़कियों के लिए यह बोलना भी पाप जैसा क्यों है कि उन्हें क्या अच्छा लगता है?

इस तरह की मानसिकता तैयार करने में हमारी शिक्षा व्यवस्था और संस्कृति भी दोषी है। याद कीजिए, क्वीन सिनेमा का वह दृश्य। जिसमें कंगना रनौत एक दुकान में सेक्स टॉय और दूसरे गैजेट बिकते देखकर पहचान नहीं पातीं, उल्टे उन्हें आम खिलौना समझकर खरीद लेती हैं! वह भी अपने पापा के क्रेडिट कार्ड से! इसे मासूमियत कहेंगे या अनाड़ीपन? या फिर सेक्स के बारे में बुनियादी जानकारियों का अभाव?

लेकिन आज की औरतें इन हालात से काफी हद तक बाहर आ गई हैं। वॉटर बेस्ड लुब्रिकेंट, ऑयल लुब्रिकेंट, सिलिकॉन लुब्रिकेंट, तरह-तरह के कॉन्डम, मसाजर्स, सेक्स गेम, रोल प्ले कॉस्ट्यूम के बारे में ना सिर्फ वे जानती हैं, बल्कि उनका बेझिझक इस्तेमाल भी कर रही हैं।

लेकिन असल मामला सेक्स लाइफ के अधूरेपन को दूर करने या उसे ज्यादा मजेदार बनाने के लिए बाहरी चीजों पर निर्भरता का नहीं है। असल मामला है, हमारा जिस्म और हमारी चाहतें। औरत के जिस्म को एक खास तरह से ऑब्जेक्टिफाई किया गया है, यह बताने की जरूरत नहीं। यौनिकता और यौन सुख, दोनों ही खूब एकतरफा हैं। मर्द को क्या अच्छा लगता है, क्या अच्छा नहीं लगता है, यही इनमें हावी हैं।

औरतों के स्तन से लेकर योनि तक को सुंदर-सुडौल बनाने के लिए तरह-तरह के प्रोडक्ट्स के विज्ञापन हम बहुत दिनों से देख रहे हैं। इन सबकी वजह है वही एकतरफा यौन सुख। बिस्तर में सिर्फ मर्द की खुशी के बारे में सोचना नियम-सा बन गया है। लड़कियों को कम उम्र से ही यह अहसास करा दिया जाता है कि उनके लिए सेक्स का मतलब है पति को खुश करना और उसके बच्चे पैदा करना।

लेकिन सोच में बदलाव का जो ज्वार आया है, उसका असर अब हर जगह दिख रहा है। पहले बाजार में जो सेक्स टॉय थे वे सिर्फ मर्दों को ध्यान में रखकर बनाए जा रहे थे। अब महिलाओं की यौन संतुष्टि का ख्याल रखकर बनाए गए सेक्स टॉय हजारों की तादाद में मौजूद हैं। भारतीय बाजारों में इनकी अच्छी मांग है। महिलाएं भी काफी रिसर्च करके अपने लिए सही टॉय चुन रही हैं।

खाने-पीने, सोने, बाथरूम जाने की तरह ही सेक्स भी हमारी जिंदगी का एक हिस्सा है। जिस तरह सेक्स का हमारी पूरी जिंदगी बन जाना असामान्य है, उसी तरह इसके बारे में सोचने या बोलने से डरना भी आसामान्य है। अपनी जिस्मानी जरूरतों और चाहतों को लेकर केवल इसलिए मुंह ना खोलना कि एक औरत के लिए यह ठीक नहीं, इस सोच से छुटकारा पाना जरूरी है। अगर खाने-पीने, सोने, बाथरूम जाने में मर्द और औरत के बीच कोई फर्क नहीं, तो यौन सुख के मामले में क्यों रहेगा?वाय शुड बॉयज हैव ऑल द फन?

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