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बंसल के चुनाव से हो गया साफ, सोनिया को अब नहीं है राहुल पर विश्वास!

किसी मां के फैसले ही बता देते हैं कि उसे अपने बेटे की नेतृत्व क्षमता पर कितना ज्यादा विश्वास है।  देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के कुनबे का हाल भी ऐसा ही है जहां सोनिया गांधी बेटे राहुल गांधी की राजनीतिक अपरिपक्वता को अच्छे से समझती हैं। इसका उदाहरण उनका हालिया फैसला है जिसमें उन्होंने कांग्रेस के सबसे वफादार नेता अहमद पटेल के निधन पर कांग्रेस का नया कोषाध्यक्ष पवन बंसल को नियुक्त कर दिया है जो कि असल में उनके ही कोर ग्रुप के एक विश्वसनीय नेता हैं। सोनिया अच्छी तरह जानती हैं कि उनके बेटे राहुल के नेतृत्व के अंतर्गत कार्य करने वाले नेताओं की क्षमता इतनी है ही नहीं, कि उन्हें कांग्रेस में कोई संजीदा और महत्वपूर्ण पद दिया जा सके, क्योंकि वो पार्टी का सत्यानाश करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे।

इसमें कोई शक नहीं है कि गुजरात से राज्यसभा सांसद अहमद पटेल का जाना कांग्रेस के लिए किसी बड़ी राजनीतिक और निजी क्षति से कम नहीं है। ऐसा कहा जाता था कि सोनिया गांधी ने पिछले 30 वर्षों में राजनीतिक रूप से जितने भी महत्वपूर्ण निर्णय लिए सभी में अहमद की राय जरूर थी। सोनिया गांधी ने भी अहमद के निधन पर भी कुछ इसी अंदाज में शोक जताया है। सोनिया नें उन्हें अद्वितीय कॉमरेड और एक वफादार सहयोगी’ बताया है जो दिखाता है कि अहमद की पार्टी में अहमियत क्या थी।

कांग्रेस पार्टी के नेताओं में सलमान खुर्शीद से लेकर सैफुद्दीन सोज तक सभी की यही सोच है कि कांग्रेस को दोबारा अहमद जैसा विश्वसनीय नेता मिलना मुश्किल है। ऐसी स्थिति में पार्टी को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस का नया कोषाध्यक्ष पवन बंसल को बना दिया गया है जो कि सोनिया गुट के होने के साथ ही पार्टी के एक बेहद ही कद्दावर नेता माने जाते हैं। इन सब से इतर एक महत्वपूर्ण सवाल ये भी खड़ा हो गया है कि सोनिया गांधी ने अपने ही गुट के नेता को ही क्यों पार्टी का अहम पद दिया क्या राहुल के गुट में कोई ऐसा है ही नहीं?

सोनिया के इस कदम ने एक बार फिर राहुल के नेतृत्व को लेकर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या राहुल गुट के नेताओं में इतनी क्षमता नहीं है कि वो किसी संजीदा पद पर कुशलता के साथ कार्य कर सकें? शायद नहीं। पार्टी के कई शीर्ष नेता भी यही मानते हैं कि राहुल के पास अध्यक्ष पद संभालने के बाद कोर ग्रुप की ऐसी कोई विश्वसनीय टीम है ही नहीं, जो पार्टी को आगे ले जानें में कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके। जबकि सोनिया ने अपनी कोर टीम का भरपूर इस्तेमाल पार्टी को आगे ले जाने में किया था। इस नई पौध के नेताओं में अनुभव की कमी के साथ सफलता की भी शून्यता देखी गई है।

राहुल के कोर ग्रुप की बात करें तो इसमें सबसे ज्यादा तवज्जो रणदीप सिंह सुरजेवाला को ही दी जाती है। उनके प्रभार के दम पर ही पार्टी ने बिहार का चुनाव लड़ा था, नतीजा ढाक के तीन पात ही आया है। सुरजेवाला खुद दो बार विधायकी का चुनाव हार चुके हैं। इसके अलावा केसी वेणुगोपाल, राज्यसभा सांसद राजीव सातव, सांसद मणिकम टैगोर का नाम आता है। इन सभी की नेतृत्व क्षमता जगजाहिर है। बाकी किसी की बात ही क्यों हो, जब राहुल गांधी खुद चुनावी हार के सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए अपनी पुश्तैनी सीट अमेठी से हार कर पार्टी के लिए नए मानक तैयार कर रहे हैं तो उनके अंतर्गत कार्य करने वाले अकुशल नेताओं की बात करना फिजूल ही है।

इन्हीं बिंदुओं को देखते हुए अब कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्षा सोनिया गांधी ने कोषाध्यक्ष के पद पर एक बार फिर अपने ही कोर ग्रुप के एक विश्वास पात्र नेता को बैठाया है। सोनिया जानती हैं कि राहुल की तरह ही राहुल का कोर ग्रुप भी फिसड्डी ही है। इसलिए अगर राहुल के नेतृत्व में ही पार्टी को आगे बढ़ना है तो फिर राहुल के इर्द-गिर्द अपने विश्वासपात्र और अनुभवी लोगों को बैठना होगा, जो कि मुश्किल समय में राहुल को सही राय दे सकें, जैसे सोनिया को अहमद पटेल देते थे।

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