जरा हट के

पढ़िए इनकी कहानी और लीजिए प्रेरणा, अनाथालय की बंदिशों को तोड़कर ऐसे बने IAS

गरीबी और संघर्ष से भरी कहानियाँ आज के युवाओं को बहुत प्रेरणा देती हैं. अगर कठिन परिश्रम और सच्ची मेहनत से किसी लक्ष्य को पाने की कोशिश की जाए तो वो हमेशा कामयाब होती है. आज हमारे सामने संघर्ष की एक और ऐसी कहानी है जो बहुत सारे लोगों के लिए मिसाल है. ये कहानी है केरल के मलप्पुरम जिले के बहुत ही गरीब परिवार में जन्मे शिहाब की जिन्होंने अनाथालय की बंदिशों को तोड़कर अपने सपने को पूरा किया. शिहाब के पिता अपनी पत्नी, तीन बेटियों और दो बेटों के पालन-पोषण करने में सक्षम नहीं थे इसलिए शिहाब को बहुत कम उम्र में ही अपने पिता का हाथ बंटाना शुरू करना पड़ा. वे पान के पत्ते की बिक्री करते और बांस की टोकरी बनाकर बेचते थे ताकि उनके भाई-बहन को भूखा न सोना पड़े.

समय बीतने के साथ उनके पिता बीमार रहने लगे जिसकी वजह से शिहाब को स्कूल जाने का मौका बहुत कम ही मिल पाता था. उन्हें बहुत बड़ा सदमा पहुंचा जब 1991 में उनके पिता का देहांत हो गया। वे तब सिर्फ ग्यारह वर्ष के थे. शिहाब के जीवन में एक गहरा अंधकार छा गया जिसमें उनके किसी भी सपने को जीवित रखने की कोई जगह नहीं थी. उनकी माँ पर पाँच बच्चों की ज़िम्मेदारी आ गयी और उनके पास बच्चों को पेट भर खाना देने का कोई रास्ता नहीं था. उनके बच्चें भुखमरी और मौत से बचे रहे इसलिए उन्होंने एक बेटे और दो बेटियों को अनाथालय में डाल दिया. उनकी माँ ने अपने दिल पर पत्थर रख कर अपने पति के देहांत के दूसरे ही दिन बच्चों को एक मुस्लिम अनाथालय में भेज दिया.

अनाथालय में जीवन कुछ बेहतर था लेकिन यहाँ पर औपचारिक स्कूली शिक्षा का अभाव था. वे मलयालम और उर्दू मदरसा में पढ़ते हुए बड़े हुए. उन्हें जो भी पढ़ाया जाता वे आसानी से समझ लेते थे. उन्होंने अपने शुरुआती जीवन के पूरे दस साल अनाथालय में बिताये. प्राथमिक शिक्षा के उपरांत इन्होने दूरस्थ शिक्षा से बीए इतिहास की पढ़ाई पूरी की. कुछ समय बाद शिहाब के लिए रुख बदल देने वाला समय आया जब उनके भाई जो की आयुर्वेदिक डॉक्टर बन चुके थे, ने शिहाब को सलाह दी कि वे सरकारी परीक्षा में बैठें और उन्हें उनकी यह सलाह अच्छी लगी.

पहले की गई दो कोशिशों में वे असफल रहे, परन्तु उन्होंने अपना मनोबल बनाये रखा. परन्तु चुनौतियाँ ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं. शिहाब की नवजात बच्ची को लकवा हो गया था. अपनी तीसरी कोशिश के दौरान वे किताबों और अस्पताल के बीच चक्कर लगाते रहे परन्तु फिर भी उन्होंने अपना ध्यान केंद्रित रखा और परीक्षा में बैठे. जब 2011 के यूपीएससी का परिणाम आया तब उन्होंने 226वां रैंक हासिल किया था।उन्होंने इसके आलावा फॉरेस्ट, रेलवे टिकट कलेक्टर, जेल वार्डन, चपरासी और क्लर्क आदि 21 परीक्षाएं भी सफलतापूर्वक पास की. शिहाब अभी नागालैंड के कोहिमा में पदस्थ हैं. वे अपनी सफलता का श्रेय अपने अनुशासन को देते हैं. अपने अनुशासन, कठिन श्रम और लगातार कोशिशों के बल पर उन्होंने चुनौतिओं का सामना कर सफलता पाई. शिहाब हम सभी के लिए एक प्रेरणास्रोत हैं.

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