धर्म

द्रोपदी और युधिष्ठिर को जब ऐसे देखे अर्जुन, जानें फिर क्या हुआ..?

चाणक्य नीति के अनुसार महिलाये ही सभी सुखो और दुखो का मूल है | स्त्री मनुष्य को जन्म देती है | स्त्री मनुष्य के जीवन की संगिनी है | इसलिए नारी का जीवन मे एक अलग ही स्थान है | लेकिन यह बात भी सत्य है की भारत के सबसे भयंकर युद्धों में ( रामायण, महाभारत ) नारी ही वजह रही है | महाभारत में यदि द्रोपदी ने दुर्योधन का अपमान ना किया होता तो शायद महाभारत का युद्ध भी ना हुआ होता | आज हम आपको द्रोपदी के जीवन से जिंदा हुआ ऐसा रहस्य बताने जा रहे है जो बहुत ही कम लोगो को पता है |

महाभारत की रचना महर्षि वेदव्यास ने की थी | महाभारत में वेदव्यास जी का उतना ही योगदान है जितना की आचार्य द्रोण का | यह कहानी उस समय से शुरू होती है जब अर्जुन ने द्रोपदी स्वयंवर जीता था | उस समय भीम की गलती की वजह से द्रोपदी को 5 पांडवो की पत्नी बनकर रहना पड़ा था | उस समय महर्षि व्यास ने पांडवो के लिए एक नियम बनाया था | जिसके मुताबिक एक समय में एक पांडव ही द्रोपदी के साथ रह सकता था | यदि सीधे शब्दों में कहा जाए तो एक समय में एक पांडव ही द्रोपदी के साथ सहवास कर सकता था | यदि कोई पांडव नियम तोड़ता है तो उसे 12 वर्ष का वनवास झेलना पड़ेगा | यह कठोर नियम वेदव्यास जी ने बनाया था|

द्रोपदी के साथ सहवास के लिए हर पांडव के लिए विशेष दिन निर्धारित किया गया था | पांडवो के वनवास में रहते एक दिन युधिष्ठिर द्रोपदी के साथ कुटिया में बैठा था | ऐसा कहा जाता है की चारो पांडव कुटिया के बाहर बैठे थे | उस समय अचानक से डाकुओ की आवाज आने लगी | डाकू स्त्रियों का अपहरण कर ले जा रहे थे | लेकिन जिस कुटिया में द्रोपदी और युधिष्ठिर थे उसी कुटिया में सारे हथियार रखे हुए थे | जिससे अर्जुन काफी दुविधा में पड़ गया | यदि वह अंदर जाता है तो वेद व्यास जी के द्वारा बनाये गए नियमो का उलंघन होता है |

लेकिन लुटेरों से महिलाओ और गायों को भी बचाना जरुरी था | इसलिए अर्जुन चुपके से दरवाजा खोलकर अंदर घूस गया | इसके पश्चात् उसने अपना गांडीव धनुष उठाया और डाकूओ का पीछा किया | उसने डाकुओ को युद्ध में हराया और स्त्रिओं और धन की उनसे रक्षा की और वापस अपनी कुटिया में लोट आया |

वहां सारे पांडव एकत्रित हुए | जहां अर्जुन ने अपने द्वारा किये गए अपराध के बारे में सबको बताया | इसलिए अब नियमो के मुताबिक उसे 12 वर्ष तक पांडवो और राज्य से दूर रहना था | लेकिन युधिष्ठिर ने कहा की विषम परिस्थितयों में एक वर्ष की तुलना एक वर्ष से की जा सकती है | इसलिए युधिष्ठिर ने 12 दिनों तक अर्जुन को अपने से अलग रहने का आदेश दिया | जिससे धर्म की मर्यादा भी भंग नहीं हुई और अर्जुन को दंड भी मिल गया |

कुछ दंत कथाओ में कहा जाता है की इन 12 दिनों में अर्जुन ने देवलोक की यात्रा की थी | जब उसके 12 दिन पुरे हुए तब वापस आ गया था | जबकि कुछ ग्रंथो में लिखा है की इन 12 दिनों तक अर्जुन ने अलग कुटिया बनाई थी और वही रहने लगा था | इनमे अधिकांशतः इतिहासकार अर्जुन की देवलोक गमन की बात का ही समर्थन करते है |


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