उत्तर प्रदेश

दलित-मुस्लिम-यादव आए साथ, UP में महागठबंधन इतनी सीटें करेगा साफ

हर रोज़ अब जो ख़बरें मीडिया में छायी हैं वो लोकसभा चुनाव को लेकर हैं. इसमें भी सबसे अधिक चर्चा इस बात की है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-रालोद का गठबंधन होगा या नहीं और अगर होगा तो कौन सी सीट पर कौन सी पार्टी का उम्मीदवार मैदान में होगा. इसके अलावा ये भी चर्चा है कि इस गठबंधन में रालोद की क्या स्थिति होगी और साथ ही कांग्रेस क्या इस महागठबंधन में आ पाएगी या नहीं. इन सभी सवालों के जवाब हम मीडिया के लोग ढूँढ रहे हैं और जनता भी इसको लेकर उत्साहित नज़र आ रही है.

अन्दर की बात ये है कि सपा, बसपा और रालोद में सीटों को लेकर सहमति बन गई है. रालोद तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ही कुछ सीटों पर प्रभावी है, ऐसे में उसको सीटों को लेकर ज़्यादा खींचतान नहीं करनी है, अहम् बातचीत बसपा और सपा में ही चल रही है. चलिए, समझने की कोशिश करते हैं कि इस तरह के महागठबंधन को लेकर सपा और बसपा क्यूँ उत्साहित हैं. असल में सपा का कोर वोट यादव समाज है और मुस्लिम समाज की भी पसंदीदा पार्टी सपा रही है जबकि मुस्लिम समाज बसपा को भी वोट करता आया है. वहीँ बसपा का कोर वोट दलित समाज है. सपा-बसपा अगर प्रदेश की लोकसभा सीटों पर मिलकर चुनाव में उतरती हैं तो उम्मीद ये है कि दलित-यादव-मुस्लिम का वोट एक ही जगह जाएगा. तो अब ये समझने की कोशिश करते हैं कि अगर ऐसा हुआ तो क्या समीकरण बनेंगे.

प्रदेश में मुस्लिम समाज की कुल आबादी 20 से 21% है जबकि यादव समाज की आबादी तक़रीबन 10% है, कुल दलित आबादी 21 से 22% के क़रीब है. ऐसे में अगर ये तीनों समाज एक ही जगह वोट करते हैं तो रफ़ फिगर 50% से अधिक हो जाता है. अब अगर इसमें से कुछ वोट भाजपा या किसी अन्य दल को जाते भी हैं तो दूसरी जातियों के कुछ वोट तो महागठबंधन को भी मिलेंगे. रालोद के साथ आने से जाट वोटर भी महागठबंधन के साथ होगा. ऐसे में स्थिति को अगर आँकड़ों के हिसाब से समझें तो प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 40-45 सीटों पर महागठबंधन के लिए दलित-यादव-मुस्लिम वरदान की तरह साबित हो सकते हैं. वहीँ दूसरी जातियों के वोट भी अगर महागठबंधन को मिलते हैं तो भाजपा के लिए और बड़ी मुश्किल हो जायेगी.

असल में इस बार चुनाव का माहौल जिस तरह बना है उससे ये लगता है कि भाजपा के विरोध में इस समाज के लोग हैं. दलितों और मुसलमानों की नाराज़गी भाजपा से अधिक हुई है जबकि यादव समाज भी सपा की ओर वापिस आ रहा है. ऐसे में भाजपा के लिए मुश्किल है कि वो कैसे चुनाव को मैनेज करे. ‘मोदी लहर’ के बल पर सत्ता में आयी भाजपा अपने कार्यकाल में ऐसा कुछ नहीं कर सकी है जिसके बल पर वो कोई करिश्माई जीत हासिल करने की सोचे. बड़े-बड़े वादों और दावों के साथ आयी भाजपा तीन हिन्दी राज्यों में हार के बाद ढलान पर है. ऐसे में UP जैसे राज्य में दलित-मुस्लिम-यादव एकता भाजपा के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी करेगी.

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