ख़बरराजनीति

दलितों को रिझाने में सपा का नया हथकंडा



-भाजपा ने आंबेडकर जयंती पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा
-भाजपा और सपा के पैतरों ने बढ़ाई बसपा में बैचेनी

लखनऊ। भगवान राम परशुराम की मूॢत लगाए जाने की स्पर्धा के बाद अब यूपी की सियासत में दीपावली को लेकर सियासत शुरू हो गयी है। प्रदेश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रदेश में सरकार गठन के बाद से अयोध्या में प्रत्येक वर्ष दीपावली पर दीपोत्सव और कार्तिक पूर्णिमा पर वाराणसी में देव दीपावली के आयोजन के बाद अब चुनावी वर्ष में मुख्यविपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने संविधान निर्माता बाबा डा.भीमराव आंबेडकर की जयंती पर दलित दीपावली मनाये जाने का निर्णय लिया है।

हालांकि सपा के इस निर्णय से कुछ दिन पूर्व ही केन्द्र सरकार ने आंबेडकर जयंती पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है। आंबेडकर जयंती पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किए जाने की मांग काफी दिनों से चली आ रही थी। केन्द्र के इस फैसलें का चुनावी वर्ष में चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। चुनावी वर्ष में आंबेडकर जयंती पर दलित दीपावली मनाए जाने के फैसले को लेकर सपा घिर गयी है। सपा और भाजपा में जिस तरह दलितों को रिझाने और अपने पाले में खड़ा करने की स्पर्धा चल रही है उसके बाद से बहुजन समाज पार्टी की पेशानी पर गश्त कर रही चिंता की लकीरों को साफ देखा जा सकता है।

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दलित दीवाली के मौके पर प्रदेश के प्रत्येक जनपद और देशभर में सपा कार्यकर्ता सायं समाजवादी पार्टी कार्यालय, अपने घरों पर, सार्वजनिक स्थल अथवा डा. अम्बेडकर की प्रतिमा स्थल पर दीपक जलाकर बाबा साहेेब को श्रद्धा के साथ नमन करेंगे। श्री यादव के अनुसार भाजपा के राजनीतिक अमावस्या के काल में वह संविधान खतरे में है जिससे बाबा साहेब ने स्वतंत्र भारत को नई रोशनी दी थी। इसलिए डा. भीम राव अम्बेडकर की जयंती पर समाजवादी दलित दीवाली मनायेगी। सपा के इस राजनीति पैतरे पर उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति वित्त विकास निगम के अध्यक्ष डा.लालजी निर्मल की माने तो समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव मुगल मानसिकता से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। वह भारत रत्न और संविधान लिखने वाले बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर का भी अब अपमान कर रहे हैं। मुगल जिस तरह से दलितों को हीन भावना से देखते थे उसी तरह सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव आज भी दलितों को देखते हैं। डा. आंबेडकर को वह दलितों तक ही सीमित करने की चाल चल रहे हैं। अखिलेश यादव दलितों का हमेशा विरोध करते रहे हैं। पांच वर्ष की सरकार में आंबेडकर को लेकर उन्होंने कोई फैसला नहीं लिया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सरकार बनते ही बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर का चित्र सभी सरकारी कार्यालयों में लगाने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया। सभी सरकारी अभिलेखों में बाबा साहेब भीमराव डा. आंबेडकर का पूरा नाम लिखे जाने का ऐतिहासिक फैसला हुआ। दलितों की जमीनों पर से कब्जे हटवाए गए। जबकि अखिलेश यादव ने दबंगों को दलितों की जमीनों को हड़पने का लाइसेंस दे दिया था। सभी राजनीतिक दलों ने बाबा साहेब के बंगले से मुंह मोड़ लिया था। जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बने तो उन्होंने इसके लिए कदम उठाया। उस बंगले को नीलाम होने से बचाया गया। बाबा साहेब के नाम से बने आलमबाग के बस टर्मिनल का नाम तक अखिलेश यादव की सरकार में बदल दिया गया। आंबेडकर के नाम पर दलित राजनीति करने वाले अखिलेश यादव ने एक भी दलित को यशभारती पुरस्कार तक नहीं दिया। अखिलेश यादव को आंबेडकर जयंती पर देश के प्रदेश के दलितों से अपने गलत कार्यों के लिए और गलत निर्णय के लिए माफ ी मांगनी चाहिए। उन्हें पश्चाताप करना चाहिए। सपा और भाजपा में जिस तरह दलितों को रिझाने और अपने पाले मे खड़ा करने की कवायद चल रही है उसकों लेकर बसपा की चिंता पढऩा स्वाभाविक है। बसपा के एक पदाधिकारी का कहना है कि गैर बसपा राजनीतिक दलों के आंबेडकर केवल दलितों का वोट बटोरने का जरिया मात्र है। इन दलों ने अपनी सरकारों में दलितोत्थान के लिए कुछ भी नहीं किया। सपा के मुलायम और अखिलेश के कार्यकाल में सबसे ज्यादा दलितों की उपेक्षा हुयी। पिछड़ों के नाम पर केवल स्वजातीय लोगों को ही बढ़ावा दिया गया।

दलितों को हमेशा उपेक्षा की नज़रों से देखा गया। बसपा के इस पदाधिकारी ने सत्तारूढ़ भाजपा से सवाल किया चुनावी वर्ष में आखिर कैसे आंबेडकर जयंती पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की जरूरत आन पड़ी। भाजपा को लगने लगा है कि अब अगड़ी पिछड़ी जातियों का वोट बैंक उससे सरक रहा है इसलिए वह दलितों को आकर्षिक करने के लिए यह पैतरा चल रही है। लेकिन दलित अब इन मनुवादियों की चाल को समझ गया है वह किसी का बंधुआ बनकर नहीं रहेगा। उसे अपना हित बसपा में सुरक्षित लग रहा है। बसपा दलितों के साथ सर्वसमाज के हितों का ध्यान रख राजनीति करती है। सपा और भाजपा दोनों ही दलो नें बसपा से चुनाव में गठबंधन करके दलितों का वोट हासिल करके उन्हे मूर्ख बनाया। भाजपा की कल्याण सरकार में एसएसीएसटी एक्ट का सही ढंग से पालन नहीं हुआ जिसके चलते मायावती ने वर्ष १९९७ में अपना समर्थन वापस लिया था। भाजपा और सपा दोनों ने ही पिछड़ों और अति पिछड़ों को साथ रखने के लिए दलितों की उपेक्षा की और अब चुनाव में दलितों को वोट पाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाये जा रहे है।

Back to top button