ख़बरराजनीति

‘जय श्री राम’ वाली राजनीति का ‘दक्षिणी’ वर्जन, जानें कैसे बीजेपी के काम आ रहे भगवान मुरुगन ?

गृह मंत्री अमित शाह चंद रोज़ पहले चेन्नै में थे। तमिलनाडु में अगले छह महीने में चुनाव हैं। शाह उससे पहले राजनीतिक हालात की थाह लेने और अलायंस को लेकर संदेश देने वहां पहुंचे। AIADMK यूं तो खुश नहीं हैलेकिन वह बीजेपी के साथ अलायंस जारी रखने के लिए मान गई है। सच कहें तो उसके पास कोई रास्ता भी नहीं। वह समझती है कि बीजेपी से अलग होने की क्या क़ीमत चुकानी होगी। AIADMK मसीहा जैसा दर्जा रखने वाले एमजी रामचंद्रन और जे जयललिता की पार्टी है। उसे अपनी भावनाएंगर्व और अपमान छिपाना भी आता है।

जिस तरह से AIADMK ने बीजेपी की समाज को बांटने वाली वेल यात्रा का विरोध कियाउससे लगा कि जयललिता के जाने के बाद पहली बार पार्टी नेताओं की रीढ़ कुछ सीधी हुई है। AIADMK के मंत्रियों ने तो यहां तक कहा कि एक देवता को लेकर भावनाएं भड़काने से अच्छा दूसरे तरीकों से जनता की सेवा की जाए। इसके लिए उन्हें दाद देनी पड़ेगी क्योंकि पहले पार्टी ने कई मुद्दों पर इन नेताओं का समर्थन किया था और उनके मुंह से बीजेपी के खिलाफ बोल तक नहीं फूट रहे थे।

बीजेपी असल में ‘विजयी वेल और वीर वेल’ के नारे के साथ विधानसभा चुनाव में उतरना चाहती हैजो भगवान मुरुगन से जुड़े हैं और निचले तबके के देवता हैं। यह एक तरह से ‘जय श्री राम’ वाले उत्तर भारत के नारे का तमिलनाडु का वर्जन होगा। ‘वेल’ का मतलब भाला होता है। कैलेंडर में भगवान हाथ में ‘वेल’ लिए दिखते हैं।

बीजेपी को लग रहा है कि इस सियासत से तमिलनाडु में वह अपने लिए जगह बनाने में कामयाब होगीजहां धार्मिक उन्माद और ब्राह्मणवाद के विरोध की संस्कृति रही है। इससे वह लोगों के मन से पेरियार और अन्नादोराई की यादें मिटाने में सफल होगीजो 20वीं सदी की द्रविड़ राजनीति की बुनियाद रहे हैं। उसका यह भी मानना है कि ‘विजयी वेल और वीर वेल’ के नारे से वह लोगों के मन से करुणानिधिरामचंद्रन और जयललिता की यादें भी मिटा देगी।

शाह जिस दिन चेन्नै पहुंचेसंयोग से उसी दिन जयललिता का न जाने किस चुनावी रैली का एक विडियो वायरल हो गया। उसमें वह लोगों से यह वादा लेती दिख रही हैं कि वे बीजेपी प्रत्याशियों की जमानत जब्त करवाएंगे और उसे तमिलनाडु की सीमा तक नहीं पहुंचने देंगे। बीजेपी को भी पता है कि हिंदुत्व की राजनीति यहां नहीं चलने वाली। इसलिए वह राज्य के एक देवता को चुनकर वैचारिक आंदोलन खड़ा करने की कोशिश कर रही है। वह देवता और उनके साथ हुए अन्याय की बात कहकर लोगों को अपने साथ लाने में जुटी है।

पार्टी को लगता है कि इससे वह गैरब्राह्मण जातियों को गोलबंद करने में कामयाब होगीजो यहां मेजॉरिटी में हैं। यह बीजेपी का एक छोटामोटा मास्टरस्ट्रोक ही कहा जाएगा क्योंकि राज्य में हर तीसरे आदमी का नाम भगवान मुरुगन के नाम पर है। उसे यह भी पता है कि इस चाल का तुरंत फायदा भले न मिलेइससे वह तमिलनाडु में अपने पांव जमा लेगी।

जब शाह बंगाल या तमिलनाडु जैसे ग़ैरहिंदी भाषी राज्यों में जाते हैं तो कुछ अलग अंदाज़ में चाणक्य जैसे पैंतरे आज़माते हैं। वह अपनी ज़बान पर काबू रखते हैं। ऐसी बातें करते हैंजो सबको पसंद आएंजिसे सुनकर वे खुश हों। चेन्नै में भी उन्होंने तमिल में ट्वीट किए। तमिल सभ्यता की बातें की। उसे दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक बताया। शायद उन्हें अहसास नहीं था कि यह बात बीजेपी की प्राचीन भारत की गढ़ी हुई छवि से बिल्कुल मेल नहीं खाती। वैसेभगवान राम और मुरुगन भी तो एक दूसरे से बिल्कुल अलग हैं।

अब मैंने चाणक्य का ज़िक्र कर ही दिया है तो उनके लिखे ‘अर्थशास्त्र’ के तमिलनाडु कनेक्शन की बात भी करता चलूं। शाह जब अगली बार रजनीकांत को बीजेपी जॉइन करने के लिए मनाने आएं या यह परखने कि भाई एमके स्टालिन के खिलाफ एमके अलागिरी चुनावी मैदान में भिड़ने के लिए कितने उतावले हैंतो यह उनके काम आएगा। ‘अर्थशास्त्र’ का आर शामाशास्त्री का किया हुआ अनुवाद मैसूर की ओरिएंटल लाइब्रेरी में तंजावुर जिले के एक पंडित के जरिये पहुंचा। शामाशास्त्री के 1905 के अनुवाद से पहले कौटिल्य या चाणक्यचंद्रगुप्त और उनकी गाथा एक बिखरी हुई लोककथा भर थी।

तमिलनाडु में अभी जो हो रहा हैउसे देखकर लगता है कि शाह और बीजेपी ने सीधे अर्थशास्त्र से ही सबक लिए हैं। इसमें किसी क़िले को जीतने की रणनीति का जिक्र एक जगह आता है। इसके लिए सबसे पहले बगावत के बीज बोने की सलाह दी गई है। इसमें लिखा है, ‘अगर विजेता दुश्मन के किसी गांव पर कब्जा करना चाहता है तो उसे अपने लोगों का जोश बढ़ाने के साथ दुश्मन को डराने के लिए प्रचार करना चाहिए कि उसके पास असीमित ताकत है और वह ईश्वर के बेहद करीब है।

प्रोपगैंडा के बारे में इसमें आगे लिखा हैज्योतिष के जानकारों को इसका भी प्रचार करना चाहिए कि विजेता सपने का अर्थ समझते हैं और उन्हें पशुपक्षियों की भाषा भी आती है। वैसेइसमें मोर और तोते का जिक्र नहीं मिलता। अर्थशास्त्र में लिखा हैजो लोग विजेता का संदेश लेकर जाते हैंउन्हें दुश्मन के प्रति दोस्ती का दिखावा करना चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि हमारे सम्राट मेहमानों को कितना सम्मान देते हैं। उन्हें अपने राजा की सैन्य ताकत और दुश्मन की संभावित तबाही का भी जिक्र करना चाहिए। उन्हें दुश्मन को इससे भी वाकिफ कराना चाहिए कि उनके सम्राट के राज में क्या मंत्रीक्या सैनिकसब सुखी और सुरक्षित हैं। उनके मालिक नौकरों के साथ भी पिता जैसा सलूक करते हैं। मोदी की राज्य में ग्रैंड एंट्री की तैयारी शायद ऐसे ही की जानी चाहिए।

(लेखक ने यह ‘मुंबई मिरर’ में लिखाये उनके निजी विचार हैं

Back to top button