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कोरोना से जान गंवाने वालों के शव ले जाते हैं बाबल खान, डर के सवाल पर दिए शानदार जवाब

बाड़मेर.

कोरोना की दूसरी लहर जानलेवा होने के साथ बेकाबू भी होती जा रही है। लोग जहां काेरोना मरीजों से दूर भागते हैं वहीं एक ऐसा शख्स भी है जो अपनी जान की परवाह किये बिना अस्पताल से कोरोना मरीजों का शव श्मशान घाट लेकर जाता है। हम बात कर रहे हैं अंतिम यात्रा मोक्ष वाहन चलाने वाले बाबल खान की।

मोहनजी क्रेसर निवासी बाबल खान (56) सार्वजनिक श्मशान समिति का अंतिम यात्रा मोक्ष वाहन (एंबुलेंस) चलाता है जो पिछले दो सालों से चला रहा है। कोरोना की दूसरी लहर में मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। अस्पताल में कोरोना मरीजों की मौत होने पर उनके शव को श्मशान घाट पहुंचाता है।

कोरोना मरीजों के साथ में अगर कोई परिजन होता है तो शव को वाहन में चढ़ाने में मदद भी करता है और कोई कोरोना मरीज के शव को हाथ नहीं लगाता है तो खुद बाबल खान शव को गाडी में चढ़ाने से लेकर श्मशान घाट पहुंचना और शव का अंतिम संस्कार तक करता है।

बाबल खान से बात की तो उनका कहना है कि मैं पिछले दो सालों से अंतिम यात्रा वाहन चला रहा हूं। कोरोना की दूसरी लहर में पिछले एक माह में प्रतिदिन तीन-चार शव अस्पताल से ला रहा हूं। किसी शव के साथ परिजन होते हैं तो वो वाहन में चढ़ा देते हैं। शव के कोई नहीं होता है तो मैं खुद उसे गाड़ी में चढ़ाता हूं।

सार्वजनिक श्मशान ले जाकर समिति के सदस्यों की मदद से उसका अंतिम संस्कार करता हूं। बाबल बताता है, मुझे कोई डर नहीं लगता है। मेरा यही कर्म है जो मैं कर रहा हूं। मुझे संतुष्टि है कि इस विकट परिस्थितियों में लोगों के काम आ रहा हूं।

सार्वजनिक समिति के संयोजक भैरू सिंह फुलवारिया बताते हैं कि बाबल खान को 24 घंटों में कभी भी फोन कर लो वह तैयार रहता है। मंगलवार की बात है रात को अस्पताल से फोन आया तब भी बाबल खान सब काम छोड़कर शव को लेकर आया और अंतिम संस्कार किया। गौरतलब है कि कोरोनाकाल में देश भर से ऐसी तस्वीरें भी देखने को मिली हैं कि कोरोना मरीजों को परिजन अस्पताल में छोड़ कर चले जाते हैं। उनका अंतिम संस्कार करने वाला भी कोई नहीं होता है।

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