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कोरोना का साइड इफेक्ट, स्कूल जाने वाले बच्चे कम, निजी टयूशन के मामले में जबरदस्त इजाफा

नई दिल्ली (ईएमएस)। कोविड-19 के चलते लंबे अंतराल के बाद स्कूल खुले,तब बच्चों की संख्या न के बराबर नजर आई, खासकर निजी स्कूलों में बच्चों की संख्या ना के बराबर थी।

इस दौरान भारतीय शिक्षा को समझने और उस बेहतर बनाने के लिए चलाए जा रहे अहम राष्ट्रीय शिक्षा सर्वेक्षण में जो जानकारी बटोरी है, वहां काफी चौंकाने वाली है। एक तरफ जहां सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखने को मिली है, वहीं निजी स्कूलों के दाखिले में 10 साल की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।सर्वेक्षण में पता चलता है कि निजी ट्यूशन पर निर्भरता में भी उल्लेखनीय इजाफा हुआ है, साथ ही डिजिटिल डिवाइस की ओर भी रुख में बढ़ोतरी हुई है जिसके अपने खतरे हैं, खासकर प्राथमिक स्तर के छात्रों की सीखने की क्षमता पर इसका गहरा असर पड़ा है। रिपोर्ट (16वीं रिपोर्ट) को फोन सर्वेक्षण के आधार पर तैयार किया गया, इस सितंबर और अक्तूबर के महीने में संचालित किया गया था।सर्वेक्षण में 25 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों के 581 ग्रामीण जिलों के 5-16 उम्र के 75, 234 बच्चों ने भाग लिया, इसके साथ ही प्राथमिक स्कूल में पढ़ाने वाले सरकारी स्कूल के 7,299 शिक्षकों को भी इसमें शामिल किया गया था।

रिपोर्ट बताती है कि निजी से सरकारी स्कूल की तरफ लोगों का रुझान स्पष्ट नजर आता है।आंकड़ों के अनुसार सरकारी स्कूलों में 2018 में 64.3 फीसद, 2020 में 65.8 और 2021 में दाखिले की संख्या 70.3 फीसद थी।वहीं निजी स्कूलों में जहां दाखिले का आंकड़ा 28.8 फीसद था वहीं 2021 में घटकर 24.4 रह गया। खास बात है पिछले साल सरकारी स्कूल के दाखिले में 5 फीसद की अभूतपूर्व बढ़ोतरी देखी गई। रिपोर्ट के मुताबिक बच्चों की खासकर गरीब परिवारों से आने वाले छात्रों की ट्यूशन पर निर्भरता में वृद्धि हुई है।2018 से 2021 के बीच में कुल मिलाकर 39.2 प्रतिशत बच्चे ट्यूशन ले रहे हैं।वहीं कम शिक्षा प्राप्त पालकों के अनुपात में समझें,तब वहां ट्यूशन लेने वाले छात्रों की संख्या में 12.6 फीसद का इजाफा देखने को मिला है।वहीं इसके उलट उच्च शिक्षा प्राप्त पालकों के बच्चों में यह आंकड़ा 7.2 फीसद रहा है।

सर्वेक्षण से पता चलाता हैं कि प्री-प्राइमरी कक्षा के पास डिजिटल डिवाइस के उपयोग का अनुभव नहीं होने और डिवाइस तक पहुंच की कमी होने की वजह से महामारी के दौरान भारत के सबसे कम उम्र के छात्रों को और कमजोर बना दिया है। रिपोर्ट में पाया गया है, कि कक्षा 1 और 2 के प्रत्येक 3 में से 1 बच्चा कभी असली स्कूल नहीं गया, कक्षा में शामिल नहीं हुआ।सरकारी स्कूल में छात्रों का यह आंकड़ा 36.8 फीसद और निजी स्कूल में 33.6 फीसद रहा।इसके बाद जो बच्चे महामारी के बाद पहली बार स्कूल जाएंगे उन्हें स्कूल के माहौल के साथ तालमेल बैठाने में वक्त लगेगा। इसी तरह कक्षा 1 और 2 के बच्चों में प्रत्येक 3 में से एक बच्चे के पास स्मार्टफोन या कोई डिवाइस नहीं थी।

सर्वेक्षण में करीब 65.4 फीसद शिक्षकों ने एक अहम समस्या की ओर ध्यान इंगित किया, शिक्षकों का कहना था कि उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बच्चों का बात समझने में असमर्थ होना था।जो इस ओर इशारा करता है कि बच्चों की सीखने की क्षमता पर असर पड़ा है।कर्नाटक मे मार्च 2021 में 5-15 उम्र के 20,000 बच्चों पर हुए सर्वेक्षण से पता चला कि लोअर प्राथमिक स्तर पर बुनियादी समझ में भारी गिरावट देखने को मिली है।

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