जरा हट के

कभी ठाट से घूमती थी लाल बत्ती गाड़ी में, आज चरा रहीं बकरियां

इस दुनिया में कब किस इंसान की किस्मत पलट जाए और वह राजा से रंक बन जाए इस बात का अंदाजा तक कोई नहीं लगा सकता है। अक्सर ऐसी कहानियां भारतीय फिल्मों में फिल्माई जाती हैं लेकिन असल जिंदगी में भी ऐसा होता है और इंसान खुद भी नहीं जानता था है कि उसके साथ क्या हुआ और कैसे? आज हम आपको एक ऐसे ही सच्ची घटना पर आधारित कहानी बताने जा रहे हैं जिसमें एक महिला जिसके आगे पीछे लालबत्तियों वाली गाड़ी घूमा करती थी आज वह बकरियां चरा कर अपना पालन पोषण करती है। जी हां कभी गाड़ियों में घूमने वाली महिला आज बकरी पालन करती है ताकि अपने घर का और खुद का पालन पोषण कर सकें आप भी सोच रहे होंगे की ऐसा क्या हुआ उसके साथ? तो चलिए हम बताते है पूरा सच-

दरअसल यह पूरी सत्य घटना मध्य प्रदेश की रहने वाली एक महिला की है। वह महिला एक आदिवासी है जिसका नाम जूली है। जूली आमतौर पर मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के बदरवास की रहने वाली है। जिसने कुछ सालों पहले आदिवासी जिले बदरवास से पंचायत अध्यक्ष के लिए चुनाव में प्रतिनिधित्व किया था और बड़े पैमाने पर जीत हासिल कर पंचायत अध्यक्ष के पद पर आसीन हुई थी।

जिला पंचायत के पद पर आसीन होने के बाद जूली बहुत ही ठाट-बाट से रहा करती थी उस समय वह लाल बत्ती की गाड़ी में सवार होकर ही हर जगह जाया करती थी और आगे-पीछे लाल बत्ती की गाड़ियां तैनात हुआ करती थी। यह बात तो आप भी जानते हैं कि राजनीति में आने के बाद हर राजनेता अपना घर पहले भरता है बाद में जनता की भलाई के बारे में सोचता है।

पंचायत अध्यक्ष के रुप में जूली ने अपने गांव व आसपास के लोगों की बहुत सेवा की और उनकी जरूरत के अनुसार बहुत से काम भी करवाएं इस दौरान वह अपने लिए कुछ भी करना भूल गई जिसका फल उसे यह मिला कि आज भी वह उस घर में रह रही है जो शायद रहने लायक भी नहीं है और अपने पालन पोषण के लिए बकरियां चराती है।

जी हां 5 साल पंचायत अध्यक्ष के पद पर आसीन रही जूली के पास एक सरकारी घर भी नहीं है जो कागजात में तो उसे बहुत साल पहले ही मुहैया करा दिया जा चुका है लेकिन असल में उसे अब तक वह घर नहीं मिल पाया है। जूली की किस्मत ऐसी पलटी कि वह कब मैडम से वापिस एक आदिवासी जूली बन गई उसे खुद पता नहीं चला।

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मिलने वाले घर के लिए भी उसने सरकारी दफ्तरों में बहुत गुहार लगाई लेकिन उसे वहां से भी डांट फटकार कर भेज दिया गया और अब तक उसे घर नहीं मिल पाया है। बेरोजगार और बेघर जूली आज बकरियां पाल कर अपना पालन पोषण करती है और एक टूटी फूटी झोपड़ी में रहती है।

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