धर्म

इस अप्सरा को देखकर सबका भटक जाता था मन, सैकड़ों पुरुषों से थे संबंध

धर्मशास्त्रों के मुताबिक अप्सरा देवलोक में रहने वाली अति सुंदर ,अनुपम, अनेक कलाओं में पूर्ण तरीके से दक्ष, अलौकिक दिव्य और तेजस्वी स्त्री हुआ करती थी। सदियों पुराने वेदों और पुराणों में भी अप्सराओं के इस चरित्र का वर्णन हमे देखने को मिलता है। इन ग्रंथों के मुताबिक अप्सराएं बेहद ही सुंदर होने के साथ साथ जादुई शक्ति से भी संपन्न हुआ करती थीं ऐसी मान्यता है कि जिन्हें हम हिन्दू धर्म मे अप्सरा कहकर बुलाते है उन्हें ही मुस्लिम समाज के लोग हूर कहा करते है। आज हम आपको एक ऐसी ही अप्सरा के बारे में बताने जा रहे है जिससे जुड़ी जानकारियां बेहद ही चौंकाने वाली है।

आज हम बात करने वाले है अप्सरा घृताची का

जिनकी सुंदरता को देख बड़े बड़े ऋषि मुनियों के भी ध्यान भंग हो जाया करता था। अप्सराओं को देख खुद के मन को कंट्रोल में न रख पाने से इनकी सारी मेहनत पर एक झटके में ही पानी फिर जाया करता और उनकी वर्षो की तपस्या कुछ ही छण में खत्म हो जाया करती।

स्वर्ग की अप्सराओं में से एक घृताची

अनुपम सौंदर्य की मालकिन थी। उनके बारे में ऐसा कही जाती है कि माघ के महीने में घृताची अपने अन्य गणों के साथ सूर्य पर अधितिष्ठ रहा करती थी। बेहद ही सुंदर कायाकल्प की होने की वजह से घृताची किसी के भी मन को कुछ ही छणों में भंग कर उन्हें अपने वश में कर लेने में माहिर थी।

घृताची की इसी सुंदर कायाकल्प को निहारने की वजह से

महर्षि वेदव्यास भी कामशक्त हो गए जिसकी वजह से शुकदेव की उत्पत्ति हुई। घृताची के प्रेम में पड़ने का ही यह नतीजा था महर्षि च्यवन के पुत्र प्रमिति ने इस खूबसूरत अप्सरा के साथ संबंध बनाने के बाद अपने पुत्र रुरु को उनकी गर्भ से जन्म दिया। इन सभी के अलावे कन्नौज के राजा नरेश कुशनाथ ने भी घृताची के साथ संबंध बनाने के बाद एक दो नही बल्कि 100 से ज्यादा कन्याओं को जन्म दिया।

उस वक़्त के बड़े ऋषि मुनि भारद्वाज ऋषि को तपस्या को देख

उसे भंग करने कब मकसद से भगवान इंद्रा ने घृताची का सहारा लेकर उनके तपस्या को भंग करवाने की नाकाम कोशिशें की। घृताची के द्वारा काफी कोशिश किये जाने के बाद वह आखिरकार मुनि भारद्वाज को भी अपने वश में करने में सफलता हासिल कर ली।

हुआ कुछ यूं था कि एक बार ऋषि भारद्वाज स्नान करने के बाद अपने आश्रम की तरफ लौट रहे थे तभी उसी वक़्त उनकी नज़र नदी में नहा रहे एक ऐसी कन्या के ऊपर पड़ी जिसके दर्शन मात्र से उनके खुद के ऊपर कंट्रोल खत्म हो गया। भींगे वस्त्र में बेहद ही काम उक दिख रही इस कन्या को देखने के बाद अपने मन के ऊपर भारद्वाज ने काफी कंट्रोल करने की कोशिश की पर उनकी सारी कोशिशें नाकाम रही। घृताची के दूसरे रूप को देखने के बाद उनके मन मे कामवासना की भूख उमड़ पड़ी जिसके बाद हुआ कुछ ऐसा

कामवासना की भूख

उमड़ पड़ने के बाद उसी वक़्त उनका वीर्यपात हो गया। वीर्यपात हो जाने के बाद किसी तरह ऋषि भारद्वाज ने खुद के मन को पूर्ण तरीके से कंट्रोल किया और अपने वीर्य को एकत्रित कर एक यगपात्र मे रख लिया। इस यगपात्र का नाम उन्होंने द्रोण रखा और आगे चलकर इसी यगपात्र में रखे वीर्य से द्रोणाचार्य का जन्म हुआ। जिसके बाद घृताची ने एक और मुनि रुद्राश्र से संबंध बनाए जिससे कि उन्हें 10 पुत्र और 10 पुत्री की प्राप्ति हुई।

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