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इंदिरा और प्रियंका: दादी-पोती की सूरत ही नहीं बल्कि सियासत का स्टाइल भी एक जैसा

इंदिरा की तस्वीरों के साथ प्रियंका की मुस्कान मिलाने वाले, बातचीत का अंदाज़ एक जैसा बताने वाले, प्रियंका को इंदिरा की सियासी परछाईं बताने वालों के लिए एक और दिलचस्प सच. प्रियंका सिर्फ़ अपनी दादी इंदिरा जैसी दिखती ही नहीं हैं, उन्हीं की तरह अपने लिए राजनीतिक चुनौतियां भी ख़ुद तय करती हैं. ठीक उसी तरह जैसे इंदिरा गांधी ने देश के पहले लोकसभा चुनाव में अपना लक्ष्य तय किया था.

1951-52 में जब आज़ाद हिंदुस्तान का पहला लोकसभा चुनाव था, तब इंदिरा गांधी ने राजनीति की सबसे बड़ी कसौटी के लिए ख़ुद को तैयार किया. अपने पिता और अंतरिम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को सियासी जीत दिलाकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाना. बिना किसी लंबे-चौड़े राजनीतिक अनुभव के इंदिरा गांधी ने अपने आप को सियासी शतरंज की बाज़ियों में शामिल कर लिया. उनके पास हारने के लिए कुछ नहीं था, लेकिन जीतने के लिए पूरा हिंदुस्तान था. इंदिरा गांधी ने पहली ही राजनीतिक ज़िम्मेदारी को निभाते हुए अपने जीवन के पहले लोकसभा चुनाव में करीब 12-13 घंटे काम करने का टाइम टेबल सेट किया.

लोग उसे सुनना चाहते हैं… 
पिता जवाहरलाल नेहरू ने अपनी मित्र और भारत के अंतिम वायसराय लुईस माउंटबेटन की पत्नी एडविना माउंटबेटन को 1952 में एक चिट्ठी लिखी थी. ख़त में नेहरू ने लिखा था- “1952 के चुनाव में सबसे ज़्यादा हैरान करने वाली बात थी इंदिरा की राजनीतिक इच्छाशक्ति और सियासी मैनेजमेंट. इंदिरा ने रायबरेली से लेकर फूलपुर तक और फिर दिल्ली तक चुनाव के दौरान सब कुछ बहुत अच्छी तरह नियंत्रित किया. वो (इंदिरा) सुबह 8 बजे से लेकर रात 11 बजे तक काम करती रही. रायबरेली से फूलपुर तक संसदीय क्षेत्रों में गांव-गांव और शहर-शहर प्रचार का काम देखती रही. वो बहुत अच्छी वक्ता है और जनता के बीच इंदिरा मशहूर हो रही है, लोग उसे सुनना चाहते हैं.“

तय किया सबसे बिज़ी टाइम टेबल
अपनी दादी की तरह प्रियंका ने भी बतौर पार्टी महासचिव और पूर्वी यूपी की प्रभारी बनने के बाद अपना सबसे बिज़ी टाइम टेबल तय किया है. सुबह 11 बजे से रात करीब 11 बजे तक 12 घंटे तक प्रचार-प्रसार और चुनावी रणनीतियों में शामिल रहना. कार्यकर्ताओं से मिलना, सबकी बात सुनना, रोड शो के ज़रिए एक ही दिन में कई इलाकों में दौरे करना और छोटी-छोटी जनसभाएं. ये वो चुनावी हथियार हैं, जो इंदिरा गांधी ने अपने पिता के लिए पहले लोकसभा चुनाव में आज़माए थे और जीत भी हासिल की थी. इंदिरा और प्रियंका की तुलना करने वालों को उम्मीद है कि बतौर पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा अपने पहले लोकसभा चुनाव में दादी जैसी सियासी जीत का करिश्मा दिखा पाएं. ताकि दोनों की समानताएं सिर्फ़ तस्वीरों तक ही सीमित ना रहें, सियासत में भी दिखाई दें.

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