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मुस्लिमों का एक तबका क्यों कर रहा ट्रिपल तलाक कानून का विरोध, आसान शब्दों में यहां समझिए

बदल गये राजनैतिक माहौल में “तलाक” शब्द को इतना घृणित समझ लिया गया है कि यह शब्द महिलाओं पर आत्याचार का प्रतीक बन गया है। यह एक साजिश है जिससे मुसलमान और इस्लाम की छवि पर चोट की जाए।

संघ , सरकार , मीडिया और अदालतों ने अपने मिले जुले प्रयास से इस्लामिक व्यवस्था के शब्द “तलाक” को इतना बदनाम कर दिया कि इस शब्द के सहारे मुसलमान और इस्लाम का चेहरा बदनुमा हो जाए।

मुसलमानों में शादी 7 जन्मों का बंधन नहीं है बल्कि यह इसी जीवन का एक “कांट्रेक्ट” है और निकाह के समय कांट्रेक्ट की सभी शर्तें लड़की की रज़ामंदी से तय किए जाते हैं और फिर उसी लड़की से उन्हीं शर्तों पर किसी लड़के से निकाह पढ़ाने की अनुमति ली जाती है।

ध्यान दीजिए कि यदि शर्तें लड़की को मंज़ूर नहीं तो वह वकील और दोनों गवाह के सामने इस निकाह से इंकार कर सकती है और फिर कोई माई का लाल यह निकाह नहीं करा सकता। लड़की की इजाज़त मिलने के बाद लड़के के सामने यही वकील और गवाह आते हैं और पूरी महफिल में उसे उन शर्तों को बताया जाता है। जिसे लड़का तीन बार सारे समाज के सामने कबूल करता है।

ध्यान दीजिए कि निकाह की शर्तें लड़की या उसके अभिभावक द्वारा ही तय की जाती है जिसकी पहली मंजूरी लड़की देती है जिसे लड़का स्विकार करता है।

“कबूल” “कबूल” “कबूल” लड़की द्वारा रखी शर्तों के कबूल करने की समाज के सामने स्विकरोक्ति है और फिर वह उन शर्तों पर लड़की को अपना जीवन साथी बना लेता है। लड़की जब चाहे या जब उसे लगे कि उसकी दी हुई शर्त उसका पति पूरा नहीं कर रहा है वह बिना विलंब के काजी और गवाह को बुलाकर अपने पति से अलग हो सकती है , उसे “खुला” कहते हैं। लड़की के इस अधिकार के इस्तेमाल की इतनी आसानी है कि उसे इद्दत की अवधि से भी छूट है।

इस्लाम एक मात्र ऐसा धर्म है जिसमें वैवाहिक बंधन समाप्त करने की एक बेहद सामान्य और सुविधाजनक व्यवस्था है वर्ना अन्य धर्मों में विवाह धार्मिक तरीके से होते हैं तो अलगाव जज और वकील साहब पूरी छीछालेदर करके कराते हैं।

तो इस्लाम महिलाओं को भी अपने पति से अलग होने की तलाक से कहीं अधिक आसान व्यवस्था के ज़रिये अधिकार देता है तो ऐसे ही लड़के का भी कुछ हक है , वह यदि अपनी पत्नी से सुखी नहीं और आगे का जीवन उसके साथ जीने का इच्छुक नहीं तो वह इस “निकाह” अर्थात वैवाहिक समझौते को तोड़ कर उससे अलग हो सकता है , “निकाह” वैवाहिक बंधन का नाम है तो “तलाक” वैवाहिक बंधन से अलगाव का हिन्दी नाम है।

अब कुछ प्रश्न , वैवाहिक संबन्ध टूटने की जिम्मेदारी पति और पत्नी दोनों की है तो पति अपनी पत्नी को ही गुज़ारा भत्ता क्युँ दे ? पत्नी अपने पति को गुजारा भत्ता क्युँ ना दे ? वैसे तो बहुत बराबरी की बात होती है पर यहाँ औरत अबला बन जाती है। दरअसल समाज का वातावरण ऐसा है कि “शब्द” महिला सामने आने पर उसके प्रति संवेदना उमड़ने लगती है चाहे वह महिला कितनी ही दुष्ट क्युँ ना हो।

यही दोगलापन है , वैवाहिक संबन्ध टूटने पर महिला से अधिक प्रताणित तो पुरुष होता है , महिला तो इस्लामिक व्यवस्था में पुण्य के कारण तुरंत दूसरा निकाह कर लेती है परन्तु पुरुष को क्या भोगना पड़ता है यह किसी ने सोचा है ? उसे अपनी मर्दानगी से लेकर स्वभाव और कमाई तक पर समाज को जवाब देना पड़ता है।

तो आसान भाषा में समझिए कि “तलाक” केवल अलगाव की सूचना देने का शब्द है , जैसे “कबूल” स्विकार करने का शब्द है।

बाकी भाई कौन व्यक्ति अपना घर उजाड़ना चाहेगा ? कुछ तो मजबूरियाँ हुई होंगी , कोई यूँ ही तलाक नहीं कहता। तलाक की हद तक कटु संबन्ध होने की 50% जिम्मेदार महिला भी होती है जो तलाक के बाद पीड़ित बन जाती है और मुआवजे की माँग करती है।

यही है दोगलापन और इस्लाम इसी दोगलेपन को नकारता है।

ये लेख स्वतंत्र लेखक मोहम्मद जाहिद के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है। ये लेखक के निजी विचार हैं।

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