धर्म

तिरुपति में मुंडाते हैं जो बाल, क्या होता है उनके साथ, आज जान लीजिए आप

हमारे भारत देश में हर धर्म की अपनी ही अलग मान्यताएं है. वही लोगो के मन में इन मान्यताओं को लेकर विश्वास भी देखा जा सकता है. हिन्दू धर्म में भी ऐसी ही एक परम्परा है, जिसे मुंडन करवाना कहते है. जी हां आपको जान कर हैरानी होगी कि ये मान्यता केवल छोटे बच्चो तक ही सीमित नहीं है, बल्कि मनोकामना पूरी होने पर दक्षिण में तिरुपति और तिरुमाला जैसे मंदिरो में पुरुष और बच्चो सहित महिलएं भी मुंडन करवाती है. दरअसल ऐसा कहा जाता है, कि ऐसा करने से भगवान् खुश हो जाते है. मगर आपने कभी ये सोचा है, कि बाल मुंडवाने के बाद वहां इन बालो का क्या किया जाता है?

 

वैसे आपको ये जान कर थोड़ा अजीब जरूर लगेगा, पर वास्तव में इन्ही बालो का एक बड़ा बजार है. जी हां गौरतलब है, कि जिन बालो को हम कचरा समझ कर वही फेंक देते है, वही बाल अंतराष्ट्रीय बाजार में करोड़ रूपये में बिकते है. बता दे कि सौंदर्य और कॉस्मेटिक इंडस्ट्री में इन बालो की काफी डिमांड होती है. इसके इलावा एक अनुमान के अनुसार सिर्फ तिरुमाला तिरुपति मंदिर से ही हर साल करीब 250 करोड़ रूपये में इन बालो की बिक्री होती है. हालांकि इन बालो को इस्तेमाल करने से पहले कई पड़ावों से भी गुजरना पड़ता है. तब कही जाकर ये मार्किट में बिकने के लिए उपलब्ध किए जाते है.

गौरतलब है, कि इस प्रक्रिया में सबसे पहले बालो को सुलझाया जाता है. उसके बाद इन बालो की छटनी होती है यानि इन्हे छांटा जाता है. ऐसे में बालो की गुणवत्ता, रंग, लम्बाई आदि के आधार पर इन्हे अलग किया जाता है. इसके बाद इन्हे एंटीआक्सीडेंट नामक तरल में भिगो कर इनमे पैदा होने वाले कीटाणुओं को नष्ट किया जाता है. अब हर देश में अलग अलग बालो का चलन है, तो इन बालो को साफ़ सुथरा करने के बाद इन्हे दोबारा मनचाहे रंग से डाई किया जाता है. बस फिर ये बाल किलो के भाव में बिकने के लिए बाजार में उपलब्ध करवाए जाते है. इसके इलावा इन्हे पैक करके वितरण के लिए भी तैयार किया जाता है.

इस प्रक्रिया को जानने के बाद आप समझ ही गए होंगे कि बालो से पैसे कमाना भी कोई आसान बात नहीं है . इसलिए भूल कर भी इस प्रक्रिया को खुद ट्राई करने की गलती मत कीजिएगा.

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