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पहली बार जनता की अदालत में मोदी का ‘शाही’ फैसला, क्या बोलेंगे 10 करोड़ हिंदुस्तानी?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के दूसरे कार्यकाल के 100 दिन पूरे हो चुके हैं और इन 100 दिनों में मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को समाप्त करने का साहसिक निर्णय किया, वहीं मुस्लिम समाज में व्याप्त कुरीति ट्रिपल तलाक़ को कानून के रास्ते सदा के लिए रुखसद कर दिया। ट्रिपल तलाक़ का मसला तो देश के 20 करोड़ मुस्लिमों से आधी आबादी यानी 10 करोड़ महिलाओं का ही मुद्दा है, परंतु मोदी सरकार का सबसे बड़ा निर्णय धारा 370 को हटाने का था। यद्यपि मोदी सरकार के इस निर्णय का पूरे देश ने (अपवाद को छोड़ कर) एक सुर में समर्थन किया, परंतु पहली बार धारा 370 को हटाने के मोदी सरकार के निर्णय की धरातल पर कसौटी होने जा रही है और वह भी 10 करोड़ी कसौटी।

जी हाँ। चुनाव आयोग (EC) ने आज महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर दी, जिसके अनुसार दोनों ही राज्यों में मात्र एक चरण में आगामी 21 अक्टूबर को मतदान होगा। यही वह दिन होगा, जब धारा 370 जनता की अदालत में होगी और दोनों ही राज्यों के 10 करोड़ मतदाता वोट करते समय राज्य के मुद्दों के साथ-साथ राष्ट्रवाद व राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों पर भी वोट करेंगे। 288 विधानसभा सीटों वाले महाराष्ट्र में जहाँ 8 करोड़ 90 लाख मतदाता हैं, वहीं 90 विधानसभा सीटों वाले हरियाणा में 1 करोड़ 28 लाख मतदाता हैं। दोनों ही राज्यों में इस समय भाजपा के मुख्यमंत्री हैं। महाराष्ट्र में भाजपा नेता देवेन्द्र फडणवीस शिवसेना के साथ गठबंधन वाली सरकार चला रहे हैं, तो हरियाणा में मनोहरलाल खट्टर के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत वाली भाजपा सरकार है।

धारा 370 को लेकर 5 अगस्त से राजनीतिक अखाड़े और न्यायिक मंच पर भले ही घमासान मचा हुआ हो, परंतु आम जनता ने मोदी सरकार के इस निर्णय को पूरे उत्साह से सराहा है। सोशल मीडिया पर इस साहसिक निर्णय के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की भरपूर प्रशंसा हुई, तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित दोभाल की रणनीतिक भूमिका की भी लोगों ने भरपूर सराहना की, परंतु जनता की अदालत में धारा 370 की पहली कसौटी 21 अक्टूबर को होगी, जब महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों के लिए मतदान होगा। चुनाव परिणाम 24 अक्टूबर को घोषित किए जाएँगे।

महाराष्ट्र में मज़बूत हुआ भाजपा-शिवसेना गठबंधन

महाराष्ट्र और हरियाणा में पिछले विधानसभा चुनाव 2014 में हुए थे। महाराष्ट्र की बात करें, तो लोकसभा चुनाव 2014 के बाद राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर भाजपा-शिवसेना गठबंधन में दरार आ गई थी। इसीलिए 2014 में भाजपा-शिवसेना ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था, तो दूसरी तरफ विपक्ष में भी कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा-NCP) ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। अलग-अलग चुनाव लड़ने के बावजूद नुकसान शिवसेना को हुआ था, जबकि भाजपा 122 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। शिवसेना को 282 में से केवल 63 सीटें ही मिली थीं। कांग्रेस को 42 व एनसीपी को 41 सीटों के साथ हार का सामना करना पड़ा था। बाद में शिवसेना ने मुख्यमंत्री के रूप में देवेन्द्र फडवणीस को स्वीकार किया और सरकार का समर्थन करते हुए उसमें शामिल भी हो गई। यद्यपि लोकसभा चुनाव 2019 में स्थिति बदली और भाजपा-शिवसेना फिर साथ आ गईं। इसका फायदा भी हुआ और भाजपा (23)-शिवसेना (18) गठबंधन को 41 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस (1)-एनसीपी (4) गठबंधन केवल 5 सीटों पर सिमट गया। विधानसभा चुनाव के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो महाराष्ट्र में 2014 के मुक़ाबले 2019 में अलग राजनीतिक परिदृश्य होगा, क्योंकि इस बार भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी दोनों गठबंधन बना कर चुनाव लड़ेंगे।

हरियाणा में भाजपा के 75 पार के समक्ष कोई चुनौती नहीं

90 सदस्यीय हरियाणा विधानसभा चुनाव 2014 में भाजपा को 47 सीटें मिली थीं, जबकि कांग्रेस 15, भारतीय राष्ट्रीय लोक दल (INLD) को 19 और अन्य को 9 सीटें मिली थीं। इस तरह भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला था और मनोहरलाल खट्टर मुख्यमंत्री बने थे। 2019 में भी भाजपा और खट्टर के विरुद्ध कांग्रेस या आईएनएलडी कोई बड़ी चुनौती नहीं दिखाई दे रहीं। भाजपा ने इस बार 75 पार सीटों का नारा दिया है। हरियाणा में धारा 370 का हरियाणा में असर देखने को मिल सकता है। हरियाणा में राष्ट्रीय मुद्दों पर भी मतदान होने की संभावना है। साथ ही खट्टर सरकार के कामकाज को लेकर भी आम जनता में कोई विशेष नाराज़गी नहीं है। दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्तर पर बिखर चुकी कांग्रेस की स्थिति हरियाणा में भी पतली है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा भ्रष्टाचार के मामलों में उलझे हुए हैं, तो आईएनएलडी का जनाधार भी विशेष नहीं है।

एक राज्य जितनी विधानसभा सीटों पर उप चुनाव

चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र-हरियाणा विधानसभा के सामान्य चुनावों के साथ-साथ बिहार की समस्तीपुर लोकसभा सीट और देश के विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं की रिक्त पड़ी 64 सीटों के उप चुनावों की भी घोषणा की। इन सीटों के उप चुनाव के लिए भी मतदान 21 अक्टूबर को होगा। समस्तीपुर लोकसभा सीट लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा-LJP) नेता रामविलास पासवान के भाई रामचंद्र पासवान के निधन के कारण रिक्त हुई है, जबकि जिन 60 विधानसभा सीटों पर उप चुनाव होने जा रहे हैं, उनमें गुजरात की 4 विधानसभा सीटें भी शामिल हैं। अधिकांश विधानसभा सीटें लोकसभा चुनाव 2019 में विधायकों के सांसद के रूप में चुने जाने के कारण रिक्त हुई हैं।

किन-किन राज्यों में होंगे उप चुनाव ?

चुनाव आयोग की घोषणा के अनुसार जिन राज्यों में उप चुनाव होने वाले हैं, उनमें लोकसभा की एकमात्र सीट बिहार की समस्तीपुर है, जबकि विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं की 64 सीटें हैं। इनमें अरुणाचल प्रदेश की 1, असम की 4, बिहार की 5, छत्तीसगढ़ की 1, गुजरात की 4, हिमाचल प्रदेश की 2, कर्नाटक की 15, केरल की 5, मध्य प्रदेश की 1, मेघालय की 1, ओडिशा की 1, पुड्डुचेरी की 1, पंजाब की 4, राजस्थान की 2, सिक्किम की 3, तमिलनाडु की 2, तेलंगाना की 1 और उत्तर प्रदेश की 11 सीटें शामिल हैं।

गुजरात में किन-किन सीटों पर और क्यों उप चुनाव ?

गुजरात में 182 सदस्यीय विधानसभा में 4 सीटें रिक्त हैं, जहाँ 21 अक्टूबर को उप चुनाव होंगे। इन सीटों में अहमदाबाद की अमराईवाडी, बनासकाँठा की थराद, मेहसाणा की खेरालू और महिसागर की लुणावाडा शामिल हैं। ये चारों सीटें भाजपा के कब्ज़े वाली हैं। गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 में भाजपा ने इन 4 सीटों को जीता था, परंतु लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा ने अमराईवाडी से विधायक हसमुख पटेल, थराद से विधायक परबत पटेल, खेरालू से विधायक भरतसिंह डाभी को उम्मीदवार बनाया और चारों विधायक सांसद के रूप में चुने गए। इसके बाद इन विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया था। इसी कारण इन चारों सीटों पर पुन: कब्ज़ा करना भाजपा के लिए चुनौती होगी, तो विधानसभा चुनाव 2017 में अच्छा प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस ये 4 सीटें छीन कर विधानसभा में अपना संख्या बल बढ़ाने का प्रयास करेगी।

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