उत्तर प्रदेशख़बर

पांचाली के चीरहरण पर जो चुप पाए जाएंगे, इतिहासों के कालखंड में सब कायर कहलाएँगे..!

आजम के बयान पर संसद में वीरांगना बनी जमात, उन्नाव के मुद्दे पर अबला- लाचार – गूँगी क्यूँ बनी बैठी है ???.. कभी तो बंद करिए ये बेहूदा कुतर्क कि “तब कौन बोला था और अब कौन बोला है ” ! उन्नाव में हुई ये घटना हमारे समाज और राजनीति में घुसपैठ कर रहे एक बेहद घटिया दौर की शुरुआती आहट है.

देश के अलावा किसी की भी भक्तई से आज से ही बाज़ आइए और अपने-अपने नेताओं-दलों-विचारों-खेमों का चिंटूपना छोड़कर, इस देश की क़ानून-व्यवस्था-मान-मर्यादा के बारे में सोचना-बोलना-लिखना, आवाज़ उठाना शुरू करिए नहीं तो कहीं एक दिन ऐसा न आ जाए कि हमारी पीढ़ियों को इस देश पर गर्व करना तो दूर यहाँ जीना भी दूभर लगने लगे.

सम्मान-सुरक्षा की हकदार हजारों तिकड़मों – समझौतों के सहारे संसद पहुँचने वाली महिलाएं ही हैं या जिंदगी की जंग लड़ रही उन्नाव की पीड़िता व् उसके जैसी देश की हजारों – लाखों और महिलाएं भी ?? संसद में आजम के बयान पर चीखने वाली आवाजों का मकसद सदैव तिल से ताड़ बनाने का ही रहता है, इन के लिए नारी सम्मान- अस्मिता , महिला सशक्तिकरण, स्त्री सुरक्षा तो महज चोंचले हैं पाॅलिटिक्ल माइलेज लेने के.

देश का दुर्भाग्य है कि देश की नारी की चित्कार सुन बौखलाने की बजाए देश को संसद में दोहरा चरित्र जीने वाली महिलाओं की तमाशा खड़ी करने वाली चीख सुनने से ही सुकून मिलता है. आप खुद सोचिए- आखिर उन्नाव की पीड़िता के लिए संसद की वीरांगनाएं क्यूँ नहीं चीखतीं ?

 

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