यहां होती है कुतिया महारानी की पूजा, लोग मांगते है मन्नत, ऐसे होती है पूरी…

महिलाएं कुतिया महारानी मंदिर में पूजा करने पहुंचती हैं.

झांसी : अनेकों बड़े छोटे मंदिर देखे होंगे, पूजा भी की होगी, लेकिन कुतिया महारानी का मंदिर शायद ही आपने देखा और सुना हो. झांसी से 65 किलोमीटर दूर मऊरानीपुर कसबे के रेवन गांव में सड़क के किनारे बना यह मंदिर एकबारगी किसी को भी चौंका सकता है. मंदिर में एक कुतिया की प्रतिमा स्थापित है. इस मंदिर में स्थापित कुतिया की प्रतिमा की पूजा करते हैं. यहां जल चढ़ाया जाता है. लोग कुतिया की प्रतिमा के आगे सिर झुकाते हैं. मंदिर में स्थापित कुतिया को महारानी बोल उसे धैर्य का प्रतीक तक माना जाता है.

पूजा करने आते हैं कई गांवों के लोग 

झांसी के मऊरानीपुर इलाके में रेवन और ककवारा गांव हैं. दोनों गांवों के बीच एक कुतिया का मंदिर बना है. यह मंदिर एक चबूतरे पर है. इसी पर कुतिया की प्रतिमा स्थापित की गयी है. कुतिया की प्रतिमा काले रंग की है. इसे चबूतरे पर छोटा सा स्थान बनाकर ढंका गया है. यहां महिलाएं पूजा करने जाती हैं. महिलाएं यहां जल भी चढ़ाती हैं. भजन गाती हैं. इसके आगे सिर तक झुकाती हैं. रेवन गांव की कमला बताती हैं कि कुतिया का मंदिर यहां श्रद्धा का केंद्र है. कुतिया महारानी उनकी हर मनोकामना पूरी करती हैं. कई सालों से कुतिया की पूजा की जाती है. कई गांवों के लोग कुतिया के मंदिर में पूजा करने आते हैं.

लोग यहां सिर झुकाते हैं.

इस घटना के बाद की जाने लगी कुतिया की पूजा

कुतिया को पूजा करने की शुरुआत एक घटना से शुरू हुई. बताते हैं कि काफी समय पहले यह कुतिया इन दो गांवों में रहती थी. गांव के किसी भी कार्यक्रम में यह कुतिया खाना खाने के लिए पहुंचती थी. लोग उसे खाना भी खिलाते थे. एक बार ये कुतिया इन दोनों गांवों के बीच थी. इसी दौरान रेवन गांव से रमतूला (जो किसी कार्यक्रम में खाना खाने की सूचना दिए जाने के लिए बजाय जाता था) के बजने की आवाज आई. इसकी तेज़ आवाज़ दूर-दूर तक पहुंचती थी. आवाज़ सुन कुतिया खाने के लिए रेवन गांव पहुंची, लेकिन तब तक पंगत उठ गई. इसी बीच ककवारा गांव से रमतूला बजने की आवाज़ आई. कुतिया रेवन से ककवारा की ओर लपकी, लेकिन पहुंचते-पहुंचते यहां भी पंगत ख़त्म हो गई. गांव के बुजुर्ग राम बहादुर बताते हैं कि कुतिया बीमार थी. दोनों गांवों के बीच दौड़ने के कारण वह थक गई. और थक कर दोनों गांवों के बीच बैठ गई. भूख और बीमारी के कारण यहीं उसकी मौत हो गई.

जहां हुई मौत वहीं दफ़नाया और पूजा करने लगे लोग

लोगों ने कुतिया को इसी स्थान पर दफना दिया. लोगों का कहना है कि इस कुतिया को दफनाया जाने वाला स्थान पत्थर में तब्दील हो गया. लोगों ने यह चमत्कार देख कुतिया का एक छोटा सा मंदिर बना दिया. कुछ साल पहले अब यहां कुतिया की प्रमिता भी स्थापित कर दी गई. इस मंदिर को लोग कुतिया देवी के नाम से जानते हैं. ककवारा गांव की महिला रामवती बताती हैं कि दिवाली और दशहरा पर इसकी पूजा का इसलिए भी महत्व है क्योंकि माना जाता है कि कुतिया की मौत दीवाली दशहरा के दौरान हुई थी. वह कहती हैं कि कुतिया महारानी उनकी मनोकामना पूरी करती हैं. कुतिया को धैर्य का प्रतीक माना जाता है.