राजनीति

सुषमा जी, आपकी प्रतीक्षा पूरी हुई, जो शेष है वह मेरे भीतर है…

कल ऑफिस में टीवी पर फ्लैश हुए एक आखिर ट्वीट के साथ सुषमा स्वराज मेरी स्मृतियों में ताजा थीं. ट्वीट भी ऐसा था मानों विदा की कोई चिट्ठी.

किसी की एक प्रतीक्षा सचमुच में पूरी हुई हो. संकेतों के भीतर जीवन की अंतिम इच्छा की अभिव्यक्ति.

…मैं अपने जीवन में इसी दिन को देखने की प्रतीक्षा कर रही थी.

ओह..!

प्रतीक्षा प्रतीकों का स्थायी भाव है. थमा हुआ. स्थिर.

प्रतीक्षाओं का अंत होते ही एक प्रारंभ बदल जाता है और कई अंत अपनी परिणिति में विलीन हो जाते हैं.

प्रतीक्षाओं में यात्राओं की कहानी. हम सब प्रतीक्षारत् हैं और पूरी होते ही एक यात्रा पर होंगे.

सुषमा जी आपकी प्रतीक्षा पूरी हुई. जो शेष है वह मेरे भीतर है.
एक आश्वस्ति जो आपके होने से थी.
एक विश्वास जो राजनीति में आप थीं.
एक भरोसा जो आपके होने पर मेरे जैसे उन अनगिनत लोगों को था की शेष सब ठीक है. तमाम विषमताओं और विरोधाभासों के बीच.क्योंकि जितना आपको जाना यही समझा की राजनीति में सदायता, व्यवहारकुशल, मानवीय और संवेदनशील बना रहना सुषमा स्वराज होना है.

मैं आपको कई रूप में याद रखूंगा.
राजनीति से इतर अनगिनत स्मृतियों में
उन तमाम लोगों की यादों के साथ
जो आपको कई-कई रूपों में याद रखेंगे.

विदा सुषमा जी

ये लेख पत्रकार सारंग उपाध्याय के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है। ये लेखक के निजी विचार हैं।

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