पढ़िए वो पूरा खत जो सुप्रीम कोर्ट के जजों ने चीफ जस्टिस को लिखा

देश के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के चार सिटिंग जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की. इस पीसी में चार सीनियर जजों जस्टिस चेलमेश्वर, जस्टिस जोसेफ कुरियन, जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस एम बी लोकुर ने मीडिया से बात की. जजों का कहना है कि वो ऐसा इसलिए करने को मजबूर हुए हैं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में कुछ ऐसा हो रहा है, जिससे लोकतंत्र खतरे में आ गया है. इसके साथ ही न्यायाधीशों ने 7 पन्नों के उस खत को भी सार्वजनिक किया है जो उन्होंने देश के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को लिखा था.

पढ़िए जजों के खत की मुख्य बातें-

  • हम बड़े कष्ट के साथ आपके (CJI) सामने यह मामला उठाना चाहते हैं कि कोर्ट की ओर से दिए गए कुछ फैसलों के कारण न्यायपालिका की पूरी व्यवस्था प्रभावित हुई है. इसके साथ ही अन्य अदालतों की स्वतंत्रता भी प्रभावित हुई है. वहीं भारत के मुख्य न्यायाधीश के काम पर भी असर पड़ा है.
  • इस कोर्ट ने कई ऐसे न्यायिक आदेश पारित किए हैं, जिनसे चीफ जस्टिस के कामकाज पर असर पड़ा, लेकिन जस्टिस डिलिवरी सिस्टम और हाई कोर्ट की स्वतंत्रता बुरी तरह प्रभावित हुई है.
  • स्थापना के बाद से ही कोलकाता, बॉम्बे और मद्रास हाईकोर्ट में नियम और परंपराएं तय थीं. इन कोर्ट्स के काम पर इस अदालत के फैसलों ने विपरीत असर डाला है जबकि सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना तो खुद इन उच्च न्यायालयों की सदी के बाद हुई थी.
  • सिद्धांत यही है कि चीफ जस्टिस के पास रोस्टर बनाने का अधिकार है. वो तय करते हैं कि कौन सी बेंच और न्यायाधीश किस मामले की सुनवाई करेगा. यह विशेषाधिकार इसलिए है, ताकि सुप्रीम कोर्ट का कामकाज सुचारू रूप से चल सके
  • लेकिन इससे चीफ जस्टिस को उनके साथी जजों पर कानूनी, तथ्यात्मक और उच्चाधिकार नहीं मिल जाता. इस देश के न्यायशास्त्र में यह स्पष्ट है कि चीफ जस्टिस अन्य जजों में पहले हैं, बाकियों से ज्यादा या  कम नहीं.
  • मुताबिक इसी सिद्धांत के तहत इस देश की सभी अदालतों और सुप्रीम कोर्ट को उन मामलों पर संज्ञान नहीं लेना चाहिए, जिन्हें उपयुक्त बेंच द्वारा सुना जाना है. यह रोस्टर के मुताबिक तय होना चाहिए.
  • ऐसे कई मामले हैं जिनका देश के लिए बहुत महत्व है लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने उन मामलों को तर्क के आधार पर देने की जगह अपनी पसंद वाली बेंचों को सौंप दिया गया. इसे किसी भी हाल में रोका जाना चाहिए.
  • यहां हम किसी भी मामले का जिक्र कर, अदालत की प्रतिष्ठा को हानि नहीं पहुंचाना चाहते. लेकिन इस वजह से न्यायपालिका की छवि को नुकसान हो चुका है.
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