RSS की नसीहत का गूढ़ अर्थ समझिए, अब अजेय नहीं रह गए शाह-मोदी !

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आरएसएस के मुखपत्र आर्गेनाइजर में संपादक प्रफुल्ल केतकर का संपादकीय छपा है. राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ ने सलाह दी है कि बीजेपी को दिल्‍ली में संगठन का पुनर्गठन करना चाहिए क्‍योंकि राज्‍यों के चुनावों में पीएम नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह हमेशा जीत नहीं दिला सकते हैं.

संघ के अंग्रेजी मुखपत्र ऑर्गेनाइजर में छपे संपादकीय में दिल्‍ली विधानसभा चुनाव 2020 में बीजेपी की रणनीति को दोषपूर्ण बताया गया है. ऑर्गेनाइजर के संपादक प्रफुल्‍ल केतकर ने लिखा है कि दिल्‍ली में विचारधारा और नजरिये की लड़ाई थी. पूरे चुनाव में सीएम अरविंद केजरीवाल और उनकी सरकार के खिलाफ कोई माहौल नहीं था. उनकी सरकार को बिजली और पानी बिल में कटौती का बड़ा फायदा मिला. इस पर बीजेपी ने दिल्‍ली की 1,700 अवैध कॉलोनियों को वैध घोषित कर करीब 40 लाख लोगों को फायदा पहुंचाया.

संपादकीय में बीजेपी की हार के दो प्रमुख कारण बताए गए हैं. पहला, 2015 के बाद दिल्‍ली में बीजेपी ने जमीनी स्‍तर पर मेहनत नहीं की और दूसरा प्रचार अभियान आखिरी समय में शुरू किया गया. इसीलिए बीजेपी चुनाव में अच्‍छा प्रदर्शन नहीं कर पाई. केतकर ने कई सवाल भी उठाए हैं. उन्‍होंने पूछा है कि अन्‍य राज्‍यों के मुकाबले दिल्‍ली में अलग-अलग चुनावों में मत-प्रतिशत अलग क्‍यों रहता है? उन्‍होंने खुद ही इसका जवाब भी दिया है कि दिल्‍ली में लोगों का नजरिया बदल रहा है. लोगों की सरकार से अपेक्षाएं बदल रही हैं. पारंपरिक तौर पर जनसंघ के दौर से दिल्‍ली में बीजेपी का आधार काफी मजबूत रहा है, जो अब भी पार्टी के समर्थक हैं. दूसरे राज्‍यों से आए और झुग्‍गी बस्तियों में रहने वाले लोग छूट योजनाओं के चलते पहले कांग्रेस के वोट बैंक में तब्‍दील हो गए. आप के उभार के साथ कांग्रेस के पारंपरिक मध्‍य वर्गीय वोट बैंक को छोड़कर झुग्‍गी बस्तियों में रहने वाले ज्‍यादातर मतदाता नई पार्टी के साथ जुड़ गए.

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ ने भारतीय जनता पार्टी को जोर देकर यह कहा है कि एक संगठन के तौर पर बीजेपी को यह समझने की जरूरत है कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी हमेशा मदद नहीं कर सकते. लेख में कहा गया है, नरेंद्र मोदी और अमित शाह विधानसभा स्तर के चुनावों में हमेशा मदद नहीं कर सकते हैं और स्थानीय आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए दिल्ली में संगठन के पुनर्निर्माण के अलावा कोई विकल्प नहीं है.दिल्ली चुनाव को लेकर मुखपत्र ऑर्गनाइजर में कहा गया है, साल 2015 के बाद बीजेपी की जमीनी स्तर पर खुद की ढांचागत व्यवस्था को पुनर्जीवित करने और चुनाव के आखिरी चरण में प्रचार-प्रसार को चरम पर ले जाने में दिखाई पड़ रही नाकामी अच्छी तरह लड़े गए चुनाव में मिली विफलता बड़े कारण रहे.