उत्तर प्रदेश

चौधरी की डिमांड से महागठबंधन में मचमच, मुस्लिम बाहुल्य सीटों की राह हुई मुश्किल

यूपी में बीजेपी को हराने के लिए बन रहे महागठबंधन की राह आसान नहीं दिख रही. इसमें पेंच फंसना तय माना जा रहा है. अजीत सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) ने महागठबंधन में सम्मानजक सीटों की मांग रख दी है. मंगलवार को लखनऊ में सपा मुख्यालय पर आरएलडी उपाध्यक्ष जयंत चौधरी ने बंद कमरे में सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से मुलाक़ात की. इस मुलाक़ात में उन्होंने अखिलेश के सामने 5 सीटों पर दावा ठोंका. करीब 2 घंटे चली इस मुलाकात में आरएलडी ने अखिलेश से मुज़फ्फरनगर, बागपत, मथुरा, अमरोहा समेत 5 सीटें मांगी इस पर अखिलेश ने 2 से अधिक सीटें देने से साफ़ तौर पर इंकार कर दिया. वहीं सपा प्रमुख ने इस बारे में बसपा चीफ मायावती से सहमति मिलने के बाद पूरी स्थिति स्पष्ट होने की बात कही.

सूत्रों के हवाले से खबरें आईं थी कि महागठबंधन में तय हुआ है कि सपा और बसपा 37-37 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे. रायबरेली और अमेठी लोकसभा सीट सोनिया गांधी और राहुल गांधी के लिए छोड़ दी जाएगी. बाकी की 4 सीटें सहयोगी दलों को दी जाएंगी. वहीं आरएलडी अकेले 5 सीटें मांग रही है, ऐसे में महागठबंधन में पेंच फंस सकता है.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में आरएलडी को करारी शिकस्त मिली थी. खुद पार्टी अध्यक्ष अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी चुनाव हार गए थे. हालांकि साल 2018 में कैराना लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में सपा और बसपा के सहयोग से आरएलडी के प्रत्याशी तबस्सुम हसन को जीत मिली थी. यानी इस वक्त लोकसभा में आरएलडी के एक मात्र सांसद हैं. इसके अलावा 2017 में हुए यूपी विधानसभा चुनाव में भी आरएलडी के एक मात्र विधायक जीत पाए थे.

इस फार्मूले से होता है सीटों का बंटवारा

आम तौर पर गठबंधन को लेकर जो फॉर्मूला तय होता है उसमें जिस सीट पर जिसका कब्जा होता है वो तो उसी को मिलती है. फिर देखा जाता है कि पिछले चुनाव में किस सीट पर उस राजनीतिक दल का उम्मीदवार दूसरे स्थान पर था. इस लिहाज से यदि 2014 के आम चुनावों को आधार पर बनाया जाए तो बसपा 34 सीटों पर दूसरे स्थान पर थी और सपा  31 सीटों पर दूसरे स्थान पर थी. वहीं 80 लोकसभा सीटों में बाकी की बची सीटों को वोट प्रतिशत के आधार पर बांटा जा सकता है. लेकिन सपा-बसपा गठबंधन में असल पेच मुस्लिम बहुल सीटों पर फंस सकता है.

बसपा ने विधानसभा चुनाव में 100 मुस्लिमों को दिया था टिकट 

यादव-मुस्लिम समीकरण को अपना आधार मानने वाली सपा अपना अल्पसंख्यक आधार खोना नहीं चाहेगी. वहीं, बसपा मुस्लिमों को अपने खेमे में लाने का प्रयास करती रही है. इसी उद्देश्य से साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा ने 100 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवारों को उतारा था. जबकि सपा, कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ी थी. ऐसे में सपा और बसपा के उम्मीदवारों में वोटों का बिखराव हो गया जिसका फायदा भाजपा को हुआ था.

इन मुस्लिम सीटों पर फंस सकता है पेंच 

मुस्लिम आबादी के लिहाज से रामपुर, मुरादाबाद, सहारनपुर, बिजनौर और अमरोहा ऐसी लोकसभा सीटें हैं जहां मुस्लिम आबादी 35 से 50 फीसदी के बीच है. वहीं मेरठ, कैराना, बरेली, मुजफ्फरनगर, संभल, डुमरियागंज, बहराइच, कैसरगंज, लखनऊ, शाहजहांपुर और बाराबंकी में मुस्लिम आबादी 20 फीसदी से ज्यादा और 35 फीसदी से कम है. हाल के दिनों में बसपा ने पश्चिम उत्तर प्रदेश में अपना अल्पसंख्यक आधार बढ़ाया है. लिहाजा, यही वो सीटें हैं जिन्हें लेकर पेच फंस सकता है.

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