धर्म

रावण ने अगर मानी होती इस राक्षस की बात, तो कभी नहीं वध करते श्रीराम

रावण की एक गलती की वजह से उसको अपने प्राण गंवाने पड़े थे यदि वह माता सीता का अपहरण नहीं करता तो शायद राम रावण का युद्ध नहीं होता परंतु रामायण में रावण को एक राक्षस ने इस बात को समझाने की कोशिश की थी कि वह श्री राम जी से दुश्मनी ना लें अन्यथा उसको अपने प्राण से हाथ धोने पड़ेंगे परंतु रावण को अपनी शक्ति पर काफी घमंड था जिसके चलते उसने उस राक्षस की बात नहीं मानी और उसका नतीजा आप सभी लोगों को तो पता ही है आखिर वह राक्षस कौन था? जिसने रावण को समझाने की कोशिश की थी आज हम आपको इसके पीछे की कहानी बताने वाले हैं।

दरअसल, बात तब की है जब भगवान श्री राम जी ने खर और दूषण समेत लगभग 14 हजार राक्षसों का वध कर दिया था यह खबर शूर्पणखा ने रावण को दी थी और कहा था कि तुम कैसे राजा हो जो अपनी प्रजा की रक्षा भी नहीं कर सकते वहां कोई वनवासी राक्षसों का विनाश करने में तुला हुआ है और तुम यहां भोग विलास में मग्न हो रखे हो शूर्पणखा की यह बात सुनकर रावण अपने मायावी मामा मारीच के पास पहुंचा और उसने मारीच को सारी जानकारी बताई रावण ने कहा कि वनवासी राम एक अधर्मी है और वह बिना किसी कारण ही राक्षसों का वध करने में लगा हुआ है उसके अंदर जरूर कोई बुराई है इसीलिए तो उसके पिता ने उसको घर से निकाल दिया है इसीलिए मैं तुम्हारी मदद चाहता हूं तुम वन में स्वर्ण का मृग बनकर जाओ और राम का ध्यान भटकाओ ताकि मैं उसकी पत्नी सीता का अपहरण कर पाऊं।

जब मारीच ने रावण की यह बात सुनी तो वह डर के मारे कांपने लगा था मारीच ने रावण को बताया कि तुम्हारे गुप्त चरो ने तुमको गलत सूचना दी है भगवान श्री राम जी अधर्मी नहीं है और ना ही उनको किसी प्रकार का कोई लोभ है वह तो सिर्फ अपने पिता के वचनों को पूरा करने के लिए सभी सुख सुविधाओं का त्याग कर दिया है भगवान श्री राम जी ने राक्षसों का वध किया है क्योंकि वह राक्षस ऋषियों के यज्ञ में रुकावटें उत्पन्न कर रहे थे मारीच ने रावण को समझाते हुए कहा कि तुम भगवान श्री राम जी के बारे में बिल्कुल भी नहीं जानते हो उनके सामने तुम पल भर भी नहीं टिक सकते क्योंकि वह भगवान श्री हरि विष्णु जी के अवतार हैं।

मारीच ने रावण को समझाते हुए कहा कि लगता है तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है तुम अपने साथ साथ सारे कुल का विनाश करने पर तुले हुए हो भगवान श्री राम जी ने मुझे मात्र 12 वर्ष की आयु में गुरु विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करते हुए बिना नोक का तीर मारा था उसके प्रहार से मैं सौ योजन दूर जाकर गिरा था और कई दिनों तक अचेत पड़ा रहा था तब रावण ने मारीच से कहा कि यदि तुम मेरी बात नहीं मानोगे तो मैं तुमको मृत्यु दंड दे दूंगा इतना सुनते ही मारीच को सब कुछ समझ आ गया कि रावण की मृत्यु नजदीक आ गई है तब मारीच ने यही सोचा कि रावण के हाथों मरने से अच्छा है मैं भगवान श्री राम जी के हाथों मृत्यु को प्राप्त हो जाऊं तब मारीच ने रावण की बात मानकर सोने का मृग बनने का निर्णय ले लिया था।

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