जिस दोस्त को अफसरी छुड़ाकर सांसद बनाए नीतीश कुमार, अब उनसे भी रिश्ता तोड़ने को तैयार !

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राजनीति की बेरहम राह पर कोई किसी का सगा नहीं होता. यह कहावत काफी सालों से कहती और सुनी जा रही है, लेकिन बिहार की राजनीति में यह कहावत गाहे-बगाहे चरितार्थ होते रहती है. हैरानी इस बात की है मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपनों के इस बेरुखेपन का बार-बार शिकार होना पड़ता है. इस बार नीतीश कुमार के जिस ‘अपने’ ने उन्हें आंखें दिखाई है, वह कोई और नहीं बल्कि जनता दल यूनाइटेड के पूर्व राज्यसभा सदस्य और पूर्व राजनयिक पवन वर्मा हैं.

पवन वर्मा को भारतीय विदेश सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति दिलाने के बाद नीतीश कुमार ने उन्हें राज्यसभा भेजा था. पवन वर्मा का योगदान बस इतना था कि नीतीश कुमार के एक विदेश दौरे में उन्होंने मुख्यमंत्री से मुलाकात की थी और उनके साथ काम करने की इच्छा जताई थी. जदयू से जुड़े सूत्र बताते हैं कि बमुश्किल आधे घंटे की मुलाकात में नीतीश कुमार पवन वर्मा से प्रभावित हुए थे और इसके बाद ही पवन वर्मा ने भारतीय विदेश सेवा की नौकरी से इस्तीफा देकर नीतीश कुमार की सदारत कबूल की थी और उनके आशीर्वाद से वे राज्यसभा पहुंचे थे. आज वही पवन वर्मा एनआरसी, एनपीआर और सीएए के मुद्दे पर नीतीश कुमार को आंख दिखा रहे हैं.

हालात यहां तक आ पहुंचे कि नीतीश कुमार ने उन्हें पार्टी छोड़कर जाने तक की स्वतंत्रता दे डाली. पवन वर्मा यहीं नहीं रुके. उन्होंने नीतीश कुमार पर पलटवार करते हुए कहा कि पार्टी छोड़ने के लिए वे तैयार हैं लेकिन पार्टी पहले उनकी बातों पर अपना स्टैंड स्पष्ट करे. दरअसल पवन वर्मा सीएए, एनआरसी, एनपीआर के मुद्दे पर लगातार पार्टी विरोधी रुख अपनाए हुए हैं. नागरिकता संशोधन विधेयक का जदयू ने समर्थन किया था और इसके कानून बन जाने के बाद भी पवन वर्मा लगातार इसके विरोध में बयान दे रहे हैं.

दिल्ली विधानसभा चुनाव में जब भारतीय जनता पार्टी का जदयू से गठबंधन हुआ तो पवन वर्मा की बेचैनी और ज्यादा बढ़ गई. पहले से ही आहत चल रहे पवन वर्मा ने इस गठबंधन के विरोध में भी बयान दिया और यही बात नीतीश कुमार को ज्यादा नागवार गुजरी. बिहार से बाहर बीते दो दशक में पहली बार जदयू का भाजपा से गठबंधन हुआ है और इसके बाद भी पवन वर्मा का विरोधी रुख नीतीश कुमार को हैरान कर देने वाला था.

नीतीश कुमार कई बार अपनों के बीच की बैठकी में यह कहते रहे हैं कि जिसको भी वह कुछ बनाते हैं, वही उनको छोड़कर जाता है. इतना ही नहीं नीतीश कुमार यह भी कहते रहे हैं कि जिसको भी आगे बढ़ाते हैं, वहीं उनका न जाने दुश्मन क्यों बन जाता है. दोस्त से दुश्मन बनने वालों की इस लिस्ट में पवन वर्मा का एक नया नाम जुड़ा है. पार्टी से उनकी विदाई औपचारिकता मात्र है.

जनता दल यूनाइटेड से वैसे भी किसी नेता को निकाला नहीं जाता है. समता पार्टी के समय से ही यह परिपाटी चल रही है कि पार्टी से जिसको जाना होता है, उसके लिए ऐसी परिस्थितियां ही पैदा की जाती है कि वह स्वतः पार्टी छोड़कर चला जाए. इस परिपाटी के अगले किरदार पवन वर्मा ही हैं. पार्टी से उनकी विदाई होनी तय है लेकिन उन्हें शहीद होने का मौका किसी सूरत में दिया नहीं जाएगा. देखना दिलचस्प होगा कि जिस जनता दल यूनाइटेड के सहारे वह राज्य सभा में पहुंचे थे, उसी पार्टी से उनकी विदाई का मुहूर्त कब बनता है.