उत्तर प्रदेश

शिवपाल और अखिलेश कभी नहीं आएंगे साथ, वजह एक नहीं बल्कि हैं पूरी पांच

अपने खून-पसीने से सींचकर समाजवादी पार्टी बनाने वाले मुलायम सिंह यादव अभी बीमार है लेकिन वह चाहते हैं कि सपा का कुनबा फिर एक हो. लोकसभा चुनाव में बसपा से गठबंधन के बावजूद मिली करारी हार के बाद से ही वह लगातार सपा के पुराने नेताओं से मिल रहे थे लेकिन इसी दौरान मुलायम की अचानक तबियत खराब हो गई. इसके बाद शिवपाल की वापसी पर ग्रहण लग गया था. सूत्र बता रहे हैं कि अखिलेश यादव उनकी वापसी को लेकर अभी भी तैयार नहीं हैं तो दूसरी ओर शिवपाल यादव अपने भाई की बात को मानकर वापसी करना चाहते हैं लेकिन पार्टी में लौटने के लिए उनकी कई शर्तें भी हैं.

पहली वजह

शिवपाल यादव अब अपने भतीजे अखिलेश यादव से समझौता करने के मूड में नहीं है. इस बात को वह हाल में हुई एक प्रेस वार्ता में भी दोहरा चुके हैं. हालांकि उन्होंने गठबंधन के दरवाजे खोल रखे हैं. वैसे कई और कारण है जिससे यह दोनों दिग्गज कभी भी साथ नहीं आ सकते. मुलायम सिंह यादव जब समाजवादी पार्टी के मुखिया थे, उस समय पार्टी में शिवपाल यादव नंबर दो की हैसियत रखते थे, लेकिन समाजवादी पार्टी की कमान जब से अखिलेश यादव के हाथों में आई है तब से शिवपाल खुद को उपेक्षित समझने लगे हैं.शिवपाल यादव का मानना है कि मुलायम के नेत्रत्व में सपा में जो सम्मान उन्हें मिला करता था, वह अब अखिलेश की कमान में उन्हें नहीं मिलेगा.

दूसरी वजह

शिवपाल यादव का मानना है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी अब हाशिये पर चली गई है और उसमें आत्मविश्वास की कमी है. इसी डर से लोकसभा चुनाव में सपा ने बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती से हाथ मिला लिया.लेकिन जब नतीजे आए तो बसपा शुन्य से 10 सीटों तक पहुंच गई वहीं सपा पिछले आम चुनाव की तरह केवल 5 सीटों पर ही सिमट कर रह गई. सपा अपनी पारिवारिक सीटें जैसे कन्नौज, फिरोजाबाद और बदायूं को भी नहीं बचा पाई. ऐसी स्थिति में शिवपाल यादव अपनी पार्टी के एजेंडे को सपा के वोटरों के बीच भुनाने में क़ामयाब हो सकते हैं. और एक बड़ी पार्टी बनकर उभर सकते हैं.

तीसरी वजह

ऊपर से मुलायम सिंह यादव काफी समय से अस्वस्थ चल रहे हैं. यह देख शिवपाल का अनुमान है कि अखिलेश यादव का उत्तर प्रदेश की राजनीतिक ज़मीन पर टिक पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है.इसका कारण राजनीति के क्षेत्र में अखिलेश का शिवपाल यादव से कम अनुभव होना भी बताया जा रहा है. शिवपाल अपनी पूरी राजनीतिक क्षमता से प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया को आगे ले जाएंगे जैसा कि वह दावा कर रहे हैं.

चौथी वजह

बता दें कि उत्तर प्रदेश में शिवपाल यादव का एक अपना वोट बैंक है.जिसके दम पर उन्होंने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया बनाने का फैसला लिया था.शिवपाल यादव समाजवादी पार्टी में इसलिए भी नहीं आ सकते क्योंकि अब बात उनके आत्मसम्मान की है.अगर वो अखिलेश यादव के सामने झुकते है, तो लाखों कार्यकर्ता जिस भरोसे से उनके साथ आए वह टूट जाएगा. यहीं नहीं, उनका राजनीतिक करियर भी दांव पर लग सकता है.इससे उनके अपने व्यक्तिगत वोट बैंक पर भी असर पड़ेगा.

पांचवी वजह

अखिलेश और शिवपाल के बीच तनातनी को दौर पर एक नज़र डाले तो उसमें एक बात साफ हो जाती है कि दोनो ही झुकने वालों में से नहीं हैं.अखिलेश यादव और शिवपाल दोनों ही अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करते .और शायद इसी कारण दोनों का साथ आना मुश्किल है. वहीं अखिलेश के नजरिए से देखें तो मुख्यमंत्री बनने के बाद समाजवादी पार्टी पर उनका एकाधिकार हो गया है और यही कारण है कि शिवपाल समाजवादी पार्टी से अलग हो गए हैं.यदि शिवपाल सपा में आ जाते हैं तो अखिलेश की पार्टी में पकड़ कहीं न कहीं कमजोर पड़ सकती है. इसीलिए आगामी विधानसभा उपचुनाव व 2022 चुनाव में वे बिना किसी के सहयोग के लड़ना चाहते हैं.

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