राजनीति

सरकार बताएगी या बोलेगा सिस्टम : आखिर चमकी बुख़ार इतनी बुरी तरह से फैला कैसे?

चमकी बुखार. वो बीमारी जो अक्सर हर साल आती है और कई बच्चों को अपनी चपेट में ले लेती हैं. इस बीमारी से इस साल सबसे ज़्यादा बच्चे मरे हैं और उसकी असली वजह है चुनाव. यह हम नहीं बल्कि खुद बिहार के मुख्यमंत्री ने माना है कि जो बीमारी कंट्रोल हो गई थी, वो आज इसलिए इतनी ज़्यादा फैल गई है क्योंकि अधिकतर सरकारी कर्मचारी चुनाव में लगे थे और जो बचे-कुचे थे उन्होंने अपना काम सही से नहीं किया. तो सुशासन बाबू से हमारा एक सवाल है जो उनके कर्मचारियों पर भी लागू होता है कि क्या बच्चों की जान से ज़्यादा चुनाव महत्वपूर्ण है? नितीश बाबू का हर सरकार में मुख्यमंत्री बनना महत्वपूर्ण है लेकिन इन बेकसूर बच्चों ने किसी अधिकारी का क्या बिगाड़ा था, जो इन्हें बिन मौत ऐसी तकलीफ़ से मरना पड़ा.

वक़्त रहते केंद्र और राज्य दोनों की योजना के तहत इस बीमारी का सही से इलाज़ क्यों नहीं किया गया? अस्पतालों मे बेड और ग्रामीण अस्पतालों में इसका शुरुआती इलाज़ क्यों नहीं हुआ? ऐसे बहुत से सवाल है जो राज्य से लेकर केंद्र की सरकार को जवाब देना पड़ेगा, लेकिन जब किसी को कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा तो जवाब मिले भी क्यों?

यहाँ डॉक्टर का ज़िक्र हुआ तो बंगाल के उन डॉक्टर्स की भी याद आ गई जिन्हें आज कल बड़ी असुरक्षा महसूस हो रही है! क्योंकि किसी की जान चली गई और उसके परिजन खुद पर क़ाबू न रख पाए. डॉक्टर का इल्ज़ाम है कि परिवार द्वारा उन पर हमला किया गया, उन्हें मारा गया! हम इस पर नहीं जाना चाहते वो बात जांच के बाद साफ हो जाएगी. लेकिन हम डॉक्टर्स से भी पूछना चाहते है कि ये जग जाहिर है कि सरकारी अस्पताल में स्टाफ से लेकर डॉक्टर तक ज़्यादातर मरीजों से किस तरह बर्ताव करते है, इलाज़ करने आए मरीज़ को अगर एक बार में बात समझ न आए तो किस टोन में मरीजों से बात की जाती हैं! बाकी सरकारी अस्पताल के सरकारी स्टाफ का हाल और रवैय्या किसी से छुपा हो तो बताया जाए.

हम ये नहीं कह रहे कि सभी डॉक्टर या स्टाफ ऐसे ही होते है लेकिन इस तरह देश भर में व्यापक हड़ताल कर के किसकों बताने या जगाने की कोशिश की जा रही हैं? नेताओं को, जिन्हें कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता. फ़र्क पड़ेगा तो सिर्फ दूर राज्यों से और गंभीर बीमारियों का इलाज़ करवा रहे मरीजों को क्योंकि जहां बिहार जैसे राज्य में पूरे तंत्र की लापरवाही ने बच्चों को मौत के मुंह धकेल दिया है वहीं देश के हर दूसरे बड़े अस्पताल में आपातकाल सेवा को छोड़ सब कुछ थप पड़ा है. लाखों मरीज़ देश भर में परेशान है और पूरे देश में मानों ‘मेडिकल इमरजेंसी’ लागू हो गई हो!

वैसे जैसे-जैसे मरने वाले बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है. वैसे-वैसे छोटे से बड़े मंत्रियों, नेताओं का दौरा लगना शुरू हो गया है, जिसमे रविवार को देश के स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन जी भी घूम कर आ चुके है और उनकी नज़रों के सामने ही देखते-देखते 5 बच्चों ने दम तोड़ दिया. बताइए भला कैसी स्थिति है कि देश के स्वास्थ्य मंत्री के सामने ही बच्चे मर रहे है और सब ताक रहे हैं. वहीं पूरे बिहार में इस बीमारी के लिए सिर्फ दो ही अस्पताल है और वहाँ भी पर्याप्त संसाधन नहीं हैं. इसकी भी शिकायत स्वास्थ्य मंत्री से कर दी गई है.

Back to top button