टैटू बनवाने के शौक़ीन हैं तो हो जाएं सावधान, ये खबर कर देगी आपके रौंगटे खड़े 

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कुछ सालों से लोगों में टैटू का क्रेज़ बहुत बढ़ गया है, लोग तरह-तरह के टैटू बॉड के अलग-अलग पार्ट्स पर करवाते हैं. आपने लोगों को बॉडी के सेंसिटिव हिस्सों पर टैटू कराये हुए देखा होगा. ये तो आपको पता ही होगा कि टैटू जब बनता है तो बहुत दर्द भी होता है, लेकिन फिर भी लोग दर्द सहकर इसे बनवाते हैं. अगर ये टैटू आकर्षक लगते हैं, तो इनके दुष्प्रभाव भी होते हैं. जानकारी के लिए बताते चले लेकिन ये टैटू त्वचा पर बनने के बाद केवल एक स्याही नहीं रह जाते, बल्कि यह आपकी त्वचा में एलर्जी पैदा कर देते हैं।

वैज्ञानिकों के मुताबिक

चमकीले रंग के टैटू आपके लिम्फ नोड्स (शरीर में मौजूद प्रतिरक्षा प्रणाली का एक हिस्सा) में भारी धातुओं का रिसाव कर सकते हैं और आपके शरीर में अपनी स्याही से एलर्जी कर सकते हैं। एक नए अध्ययन में पता चला है कि टैटू बनाने वाली सुई से छोटी-छोटी धातुओं के कण आपकी त्वचा में प्रवेश करते हैं और लिम्फ नोड में संचरित होने लगते हैं। इससे एलर्जी की समस्या पैदा होती है।

फ्रांस के ग्रेनोबल में यूरोपियन सिंक्रोट्रॉन रेडिएशन फेसिलिटी के वैज्ञानिकों ने टैटू बनवाने वाले लोगों के लिम्फ नोड में निकल और क्रोमियम धातुएं पाईं। ये धातुएं एलर्जी पैदा करने वाली होती हैं। जब टैटू बनाने के लिए एक रंगीन पदार्थ का इस्तेमाल किया जाता है तो टैटू की सुई से ये धातुएं बहने लगती हैं। सफेद रंग की स्याही को टाइटेनियम डाइऑक्साइड कहा जाता है और इसे अक्सर नीले, हरे व लाल जैसे चमकीले रंगों में मिलाया जाता है। अमेरिका में टैटू बनवाने का चलन काफी तेजी से लोकप्रिय हुआ है। खासतौर पर किशोरों और युवाओं में इसकी काफी दीवानगी है। प्यू रिसर्च सेंटर ने एक सर्वे में पाया कि 18 से 29 साल की उम्र के 40 फीसदी लोगों ने कम-से-कम एक टैटू तो बनवाया ही हुआ है।

ईएसआरएफ के वैज्ञानिक इनेस श्राइवर ने कहा कि आयरन, क्रोमियम, निकल और स्याही के रंग के बीच संबंध ढूंढ़ने के लिए हम पिछले अध्ययनों की जांच कर रहे थे। कई मानव ऊतक नमूनों का अध्ययन करने और धात्विक तत्वों को खोजने के बाद हमने यह महसूस किया कि यहां जरूर कुछ और मामला है। तब हमने सुई की जांच की जिसमें पता चला कि टैटू बनाने वाली सुई से छोटी-छोटी धातुओं के कण त्वचा में प्रवेश करते हैं और लिम्फ नोड में संचरित होने लगते हैं जिससे एलर्जी पैदा होती है। यह अध्ययन जर्नल पार्टिकल एंड फाइबर टॉक्सिकोलॉजी में प्रकाशित हुआ है।