देश भर में लोहड़ी की धूम

नई दिल्ली: हिमाचल प्रदेश के निचले क्षेत्रों खासकर कांगड़ा घाटी व पंजाब में आज लोहड़ी का पर्व बड़े उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। कांगड़ा घाटी में लोहड़ी की धूम है। इस त्यौहार को अपने अपने रीति रिवाजों के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर ’सुंदरिये मुंदरिये हो दूल्हा भट्ठी वाला हो’ जैसे पांरपरिक गीत को घर-घर सुनाकर बच्चे लोहड़ी मांगने के साथ साथ मकर संति का संदेश भी देते हैं। बच्चे टोलियों नाचते गाते झूमते घर घर जाकर त्रतु परिवर्तन का संदेश देते हैं। गलियों बाजारों में अलग नजारा देखने को मिलता है। लोहड़ी के त्यौहार पर लोहड़ी गीतों का विशिष्ट महत्त्व रहता है। इसके बिना लोहड़ी आधी-अधूरी मानी जाती है, यह लोक गीत हमारी पंरपरा की अमिट पहचान हैं। लड़कों की अपेक्षा लड़कियों के गीत अधिक मरमिक और हृदयस्पशा होते हैं।

मकर संति की पूर्व संध्या पर अतीत से ही लोहड़ी मनाने की परंपरा जहां पूरे देश और प्रदेश में प्रचलित है वहीं पर कांगड़ा जिला के धरोहर गांव प्रागपुर में मनाया जाने वाला लोहड़ी पर्व की समूचे उत्तरी भारत में अलग पहचान है। कांगड़ा जिले के परागपुर धरोहर गांव का इतिहास 550 वर्ष पुराना है, जिसका नामकरण तत्कालीन जसवां रियासत की राजकुमारी पराग के नाम पर किया गया था। इस धरोहर गांव की गणना पर्यंटन जगत के विख्यात धरोहर गंतव्य स्थलों में की जाती है, जहां देश के इस प्राचीनतम गांव को देाने के लिए हर वर्ष बड़ी संया में पर्यंटक आते हैं।

प्रागपुर की लोहड़ी कालांतर से बड़े परंपरागत ढंग से मनाईं जाती है, इस दिन सभी लोग एक जगह एकत्रित होकर लकड़ियां जलाकर उसके चारों ओर बैठकर खुशी के तराने गुनगुनाते हैं इसके साथ ही सुख समृद्घि और खुशहाली के लिए तिल-चौली बनाना, तिल-अलसी, शक्कर मिश्रित लड्डू बनाना, मक्की के दाणे उबालना प्रसिद्घ है। अग्नि पूजा का लोहड़ी में विशेष महत्व रहता है। अग्नि में लोहड़ी पर बने अनेक पकवान भेंट कर उसे प्रसन्न करके ही बांटने-खाने की परपरा है। इसके साथ ही दूल्हा भट्ठी की कहानी का भी बखान करते हैं। प्रागपुर की लोहड़ी के प्राचीन महत्व को मध्येनजर रखते हुए प्रदेश सरकार द्वारा इसे राज्य स्तरीय मेले का दर्जा प्रदान किया गया है ताकि मेले में सांस्वृतिक इत्यादि गतिविधियों को शामिल करके और आकर्षक बनाया जा सके।

लोहड़ी का धरमिक एवं वैज्ञानिक महत्व है स्थानीय भाषा में यह कहावत काफी प्रसिद्घ है कि ’आईं लोहड़ी गया शीत कोढ़ी’ अर्थात लोहड़ी आने से शीत का प्रकोप कम हो जाता है। इसे खिचड़ी का त्यौहार के रूप में भी जाना जाता है। इस पर्व को दक्षिण भारत में पोंगल, पािम बंगाल में मकर संति और असम में बिहू के नाम से मनाया जाता है। भारतीय ज्योतिष विज्ञान में 12 राशियां मानी गयी हैं एवं प्रत्येक राशि में प्रत्येक माह में सांमण होता है।ज्योतिष में मकर राशि का स्वामी शनि तथा प्रतीक चिन्ह मकर को माना गया है। हिन्दू धर्म तथा संस्वृति में मकर एक पवित्र जीव है। मकर संक्रांति में सूर्यं अपना पथ परिर्वतित कर उत्तरायण में प्रविष्ट होते हैं अत: इसे अत्यंत पवित्रा माना जाता है।

लोहड़ी से संबंधित लोक-कथा

वैसे तो लोहड़ी के दिन के साथ अनेक लोक-कथाएं जुड़ी हैं लेकिन दुल्ला-भट्टी की कथा खास महत्व रखती है। कहते हैं कि दुल्ला-भट्टी नाम का गरीबों का मददगार था। कहा जाता है कि पंजाब में संदलवार में लड़कियों को गुलामी के लिए अमीरों को बेचा जाता था। जब दुल्ला को इस बारे में पता चला तो उसने एक योजना के तहत लड़कियों को आजाद कराया व उनकी शादी भी करवाई। इसी वजह से उसे पंजाब के नायक की उपाधि भी दी गई थी। इसी दौरान उसने एक गांव की दो अनाथ लड़कियों सुंदरी व मुंदरी को अपनी बेटियां बनाकर उनका विवाह कराके उनका कन्यादान किया था। उनके विवाह के समय दुल्ले के पास शक्कर के अलावा कुछ भी नहीं था तो उसने सेर भर शक्कर दोनों की चुनरी में डालकर उन्हें विदा किया था।