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कॉफी के कप के दम पर खड़ा किया जो एंपायर, वही बन गया डूबने की वजह

कैफे कॉफी डे के फाउंडर और पूर्व केंद्रीय मंत्री एस. एम. कृष्णा के दामाद वी. जी. सिद्धार्थ कर्नाटक के तटीय शहर मंगलुरु जाने के दौरान रास्ते से सोमवार रात से लापता थे. बुधवार सुबह उनका शव मिल गया है. उनके द्वारा लिखे एक पत्र में कहा गया है कि उन पर कर्जदाताओं का ‘भारी दबाव’ था.

सिद्धार्थ की कहानी बेहद दिलचस्प है. एक छोटे से साइबर कैफ़े के रूप में शुरू होकर दुनिया की सबसे नामचीन कैफ़े चेन में शुमार करने वाले इस आइडिया के पीछे एक साधारण सोच थी. कर्नाटक के चिक्कमंगलुरु में जन्मे सिद्धार्थ का परिवार शुरू से ही कॉफ़ी की खेती से जुड़ा था. मैंगलोर विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद उनके सामने पारिवारिक कारोबार को आगे बढ़ाने का शानदार विकल्प था, लेकिन अपने दम पर कुछ करने और खुद की एक अलग पहचान बनाने के उद्देश्य से उन्होंने मुंबई का रुख किया.

आँखों में सपने लिए मुंबई पहुंचे के बाद वे जे.एम फाइनेंसियल कंपनी के मुखिया महेंद्र कामपानी से मुलाकात करने के लिए वे सीधे उनके ऑफिस पहुँच गए, वो भी बिना किसी अपॉइंटमेंट के. बस तब से उनकी एक नए सफर की शुरुआत हुई. महेंद्र कामपानी के साथ काम करके सिद्धार्थ को ट्रेडिंग और स्टॉक मार्केट का बहुत ज्ञान मिला.

इसी दौरान एक बार वे जर्मनी के एक बहुत बड़े कॉफ़ी ब्रांड के मालिक से एक डील के सिलसिले में बात कर रहे थे. उनकी बातों से वे इतने प्रभावित हुए की साल 1993 में उन्होंने अमलगमेटेड बीन कंपनी (एबीसी) के नाम से कॉफ़ी निर्यात की कंपनी शुरू की. ये कंपनी सालाना 28,000 टन कॉफ़ी निर्यात करती थी. साथ ही सिद्धार्थ कुछ अलग और अनोखा करने के लिए हमेशा रिसर्च करते रहते थे. सिद्धार्थ एक ऐसा इंटरनेट कैफ़े खोलने का सोचे, जहां लोगों के बैठने की अच्छी जगह और साथ में वे वहां कॉफी का भी लुफ्त उठा सकें. इसी सोच के साथ उन्होंने 1996 में बेंगलुरु और चेन्नई में कैफ़े कॉफी डे खोला.

यह बंगलुरू का पहला इंटरनेट साइबर कैफ़े था.  धीरे-धीरे युवाओं में इसका क्रेज़ बढ़ता गया और कैफ़े कॉफी डे एक कैफ़े श्रृंखला में तब्दील हो गया. आज कैफे कॉफी डे के देश भर में 1600 से ज्यादा आउटलेट्स हैं. यहां 6000 से अधिक कर्मचारी भी काम करते हैं. कैफ़े कॉफी डे भारत के अलावा मलेशिया, इजिप्ट, ऑस्ट्रिया, सिजक जैसे देशों में भी फैला हुआ है. लेकिन कॉफी बेचते-बेचते सिद्धार्थ से बिजनेस में कुछ ऐसे गलत फैसले भी हो गए, जिससे उनकी कंपनी पर सात हजार करोड का कर्जा चढ़ गया.

सूत्रों के अनुसार, जान देने से पहले सिद्धार्थ ने अपने सीएफओ से 56 सेकेंड के लिए बात की थी. उन्होंने CFO को कंपनी का ख्याल रखने के लिए कहा था. जिस वक्त वह अपने CFO से फोन पर बात कर रहे थे, तो काफी निराश थे. CFO से बात करने के बाद उन्होंने अपना फोन स्विच ऑफ कर दिया था.

इसी बीच उनकी एक चिट्ठी भी सामने आई है. इस चिट्ठी में सिद्धार्थ ने लिखा है, मैंने बहुत संघर्ष किया लेकिन एक इक्विटी पार्टनर के दबाव को और बर्दाश्त नहीं कर सकता. वह मुझ पर लगातार शेयर बायबैक करने के लिए दबाव बना रहे हैं, जो ट्रांजेक्शन मैंने आंशिक रूप से 6 महीने पहले एक दोस्त के साथ पूंजी इकट्ठा करने के लिए किया था. सिद्धार्थ ने अपने निवेशकों से माफी मांगते हुए सरेंडर करने की बात लिखी है.

ये सब हालात इशारा कर रहे हैं कि मुमकिन है कि कर्ज के बोझ तले दबे सिद्धार्थ ने नदी में कूदकर अपनी जान दे दी है.

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