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जो विनोबा ने कहा, वही है कश्मीर की कारुणिक स्थिति का दीर्घकालिक समाधान

22 मई, 1959 को विनोबा के पैर कश्मीर की धरती को अपने पदचापों से तरंगित कर रहे थे। कश्मीर में विनोबा की पदयात्रा लगातार चार महीनों तक चली थी।

कश्मीर में प्रवेश करने से पहले उन्होंने कहा था- “मैं एक शांति सैनिक के रूप में कश्मीर जा रहा हूँ।”

विनोबा के साथ गए स्त्री-पुरुषों की टोली यह गीत गाती चलती –

शांति के सिपाही चले, क्रांति के सिपाही चले,
लेके खैरख्वाहि चले, रोकने तबाही चले।
वैर-भाव तोड़ने, दिल को दिल से जोड़ने,
काम को संवारने, जान अपनी वारने।। शांति के…

कश्मीर पहुँचते ही विनोबा ने कहा—

“कश्मीर में मेरी अपनी कोई योजना नहीं है। मैंने सब भगवान् पर छोड़ दिया है। अगर भगवान् चाहेगा तो मैं यहां तीन काम करूंगा। मैं देखूंगा, मैं सुनूंगा और मैं प्रेम करूंगा।

…भगवान ने प्रेम करने की जितनी ताकत मुझे दी है, उस सारी ताकत को मैं यहां खर्च करना चाहूंगा। कम पड़ेगी तो मैं उससे और मांग लूंगा। मुझे बोलना ही पड़ा, तो प्रेम करने के लिए बोलूंगा। अधिक बोलूंगा ही नहीं।”

विनोबा के कश्मीर पहुँचने पर वहाँ के तत्कालीन प्रधानमंत्री बख़्शी ग़ुलाम मुहम्मद ने उनसे मिलकर घोषणा की कि पूरे कश्मीर की सरकारी जमीन भूदान आंदोलन के लिए दान की जा सकती है।

विनोबा से मिलने वहाँ के सभी राजनीतिक पक्षों के लोग पहुँचे। सबने खुलकर अपनी बात रखी। शेख अब्दुल्ला उन दिनों जेल में थे। विनोबा उनसे भी जेल में मिले।

लेकिन विनोबा का असल काम था लोगों के बीच घूम-घूम कर प्रेम का संदेश फैलाना और हृदय जोड़ना। इसलिए वे कश्मीर के दुरूह से दुरूह इलाकों में पैदल निकल पड़ते। दूर-दराज के गाँवों में जाते। लोगों के साथ खूब घुलते-मिलते।

वे वहाँ ऐसे सुदूर गाँवों तक में पहुँचे, जहाँ बाहर का कोई आदमी शायद ही कभी पहुँचता हो। वे घर-घर जाते, परिवार के सभी सदस्यों से बात करते और उनके सुख-दुःख जानते।

एक दिन एक कश्मीरी भाई विनोबा को अपनी ज़मीन दान करने आए। उन्होंने कहा कि उनकी बेगम ने उन्हें भेजा है। दरअसल उस बहन ने किसी अखबार में विनोबा का फोटो देखा जिसमें वे किसी का हाथ पकड़कर किसी कठिन पहाड़ी रास्ते को पार कर रहे थे।

उस फोटो को देखकर उस बहन को लगा कि यह शख्स गरीबों के वास्ते इतनी तकलीफ उठाता है, इसलिए इसे जमीन न दें तो ठीक नहीं होगा। विनोबा ने इस घटना पर कहा था-

“जिस औरत को वह तस्वीर देखकर अंदर से यह सूझ आई कि हमें गरीबों के वास्ते कुछ करना चाहिए, उसके तमद्दुन (सभ्यता) में क्या कुछ कमी है! मैं मानता हूँ कि पीरपंजाल की साढ़े तेरह हजार फुट की जिस ऊँचाई पर मैं चढ़ा था, उस पहाड़ से भी उस बहन की ऊँचाई ज्यादा है।”

अपनी यात्रा के निचोड़ के रूप में विनोबा ने कहा था-

“अगर कश्मीर के सवाल को हल करना है, तो राजनीतिक और साम्प्रदायिक दोनों पद्धतियाँ छोड़नी पड़ेंगी और आत्मिक या आध्यात्मिक पद्धति अपनानी होगी। …राजनीति मनुष्यों को जोड़ने के बदले तोड़ने का काम करती है, और उसके कारण कड़ुवाहट और झगड़े पैदा होते हैं।

…विज्ञान युग में यह बहुत हानिकारक है। इसलिए अब विज्ञान के साथ आध्यात्मिकता को जोड़ने की बहुत आवश्यकता है। इस आध्यात्मिकता का अर्थ धर्म अथवा संप्रदाय नहीं है। आज के विज्ञान-युग में अब राजनीति और संप्रदाय के दिन लद चुके हैं।”

विनोबा कश्मीर में प्रायः कहते कि धर्म (मजहब) अलग चीज है और रूहानियत (अध्यात्म) अलग। मजहब हमें बाँटता, तोड़ता और लड़ाता है, जबकि रूहानियत हमें एक-दूसरे से जोड़ती है।

गणित को ही अपनी समस्त चिंतन का आधार बनाने वाले विनोबा ने कश्मीर यात्रा के दौरान ही अपने एक सार्वजनिक संबोधन में यह अनोखा समीकरण दिया था-

विज्ञान + राजनीति = सर्वनाश
विज्ञान + अध्यात्म = सर्वोदय

कश्मीर की कारुणिक स्थिति का दीर्घकालिक समाधान वही है जो विनोबा ने कहा।

‘मजहब’ और ‘राजनीति’ का पर्दा आँखों पर से हटाएँ। पाकिस्तान और भारत के हुक्मरान रणनीति और कूटनीति वाले नज़रिए से बाज आएँ। कश्मीर को केवल एक भूभाग और मिल्कियत के रूप में देखना बंद करें।

कश्मीर की निरीह जनता भी अपनी ‘मजहबी’ पहचान से मुक्त हों। शेष भारत के लोग भी, खासकर युवा अपनी अंध-सांप्रदायिकता से मुक्त हों। यह दोनों ही तरफ एक विनाशकारी बीमारी है, जो सबको बीमार बना चुकी है।

बिना प्रेम के तो अपनी बात अपने नन्हें बच्चे से भी नहीं मनवा सकते। ये तो सवा करोड़ कश्मीरी लोग हैं। इनके पास हृदय है, विचार है और चेतना है।

हर्फ़ और नक्शा बदल देने से कोई अपना नहीं हो जाता। अपना बनाना पड़ता है।

आखिरी बार शुद्ध करुणा से उनके हृदय को छूने का प्रयास हमने कब किया? उन्हें निश्छल प्रेम के साथ गले लगाने का प्रयास कब किया? इंसानों के बीच रूहानी एकता को समझने का प्रयास कब किया?

ये लेख स्वतंत्र लेखक ‘अव्यक्त’ के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है। ये लेखक के निजी विचार हैं।

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