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उद्धव चाहे जो बोलें…कुर्सी पर हक तो फडणवीस का ही बनता, सबूत हैं ये आंकड़े

महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन को लेकर भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के बीच जिस तरह तलवारें खिंची हैं, उससे महाराष्ट्र की जनता सकते में है. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में जनता ने भाजपा (105)-शिवसेना (56) गठबंधन को 161 सीटों पर भव्य जीत देकर कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस को विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया. इसके बावजूद मुख्यमंत्री पद को लेकर भाजपा-शिवसेना के बीच जारी मतभेद के कारण राज्य में 10 दिनों के बाद भी नई सरकार का गठन नहीं हो सका है.

दरअसल भाजपा-शिवसेना के बीच तल्खी का मुख्य कारण विधानसभा चुनाव 2014 की तुलना में भाजपा की सीटों में कमी आना है. भाजपा की स्थिति कमज़ोर होने का उपयोग शिवसेना अपने खोए हुए रुतबे को दोबारा हासिल करने के लिए करना चाहती है, जबकि शिवसेना यह भूल जाती है कि 2014 की तुलना में उसे भी कम सीटें मिली हैं. 2014 में भाजपा-शिवसेना ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था और भाजपा को 122, तो शिवसेना को 63 सीटें मिली थीं. 2019 में दोनों ने साथ मिल कर चुनाव लड़ा. इसके बावजूद भाजपा की सीटें घट कर 105 पर आ गईं, तो शिवसेना की सीटों का ग्राफ भी 56 पर सिमट गया.

चुनाव परिणामों की तह में जाने पर पता चलता है कि राज्य की जनता ने शिवसेना के सहयोग से देवेन्द्र फडणवीस को ही दोबारा मुख्यमंत्री बनाने का जनादेश दिया है. 288 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव में भाजपा-शिवसेना ने गठबंधन कर चुनाव लड़ा था, जिसके अनुसार भाजपा ने 150 सीटों पर, तो शिवसेना ने 124 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. भाजपा ने 150 सीटों में से 105 पर जीत हासिल की. इस तरह भाजपा की जीत का प्रतिशत 70 जितना ऊँचा है, जबकि शिवसेना ने 124 सीटों पर चुनाव लड़ कर केवल 56 पर जीत हासिल की, जो केवल 45 प्रतिशत जीत दर्शाता है.

बात प्राप्त मतों की करें, तो उसमें भी शिवसेना की तुलना में भाजपा का पलड़ा भारी है. भाजपा को 25.75 प्रतिशत वोट हासिल हुए हैं, जबकि शिवसेना को मात्र 16.41 प्रतिशत वोट ही प्राप्त हुए हैं. कुल मिला कर महाराष्ट्र का जनादेश भाजपा-शिवसेना गठबंधन के पक्ष में, शिवसेना के सहयोग से फडणवीस को दोबारा सीएम बनाने के लिए ही है.

 

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