प्लास्टिक नहीं बल्कि इस चीज से बनता है कैप्सूल का खोल, जानकर हमेशा के लिए जाएंगे घिन्ना

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जब भी हम बीमार होते हैं, डॉक्टर के पास जाते हैं। डॉक्टर हमारी बीमारी को दूर करने के लिए हमें कुछ दवाईयां खाने को कहते हैं और इन्हीं दवाईयों को खा कर हम ठीक भी हो जाते हैं। वहीं बदलते लाइफस्टाइल की वजह से होने वाले रोगों के इलाज के लिए तो अब घर- घर में लोगों की जिंदगी दवाईयों पर ही टिकी हुई है। क्या कभी आपने सोचा है कि हम जो दवाईयां खाते हैं वो किस चीज की बनी होती है। दवाईयों में कैप्सूल तो हम सभी ने खाया होगा, लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि जिस कैप्सूल के अंदर तो दवाईयों का पाउडर होता है, लेकिन उसका उपरी भाग किस चीज का बना होता है। देखने और छूने से शायद आपको यही लगता होगा कि ये प्लास्टिक का बना होता है, लेकिन ऐसा नहीं है। अगर आपको भी ये मालूम पड़ जाएगा कि कैप्सूल का उपरी भाग किस चीज का बना होता है, तो शायद आप भी इसे खाना छोड़ देंगे।

कैप्सूल का जो बाहरी हिस्सा हमें आपको प्लास्टिक से बना नजर आता है, वो प्लास्टिक नहीं है। यानी ये प्लास्टिक से नहीं बनता। दरअसल, ये प्लास्टिक जैसे दिखने वाले जिलेटिन से बना होता है। अब आप सोच रहे होंगे कि ये जिलेटिन क्या है। तो हम आपको ये बता दें कि जिलेटिन एक पशु उत्पाद है। यानी कि इसे बनाने में जानवरों का प्रयोग किया जाता है। जिलेटिन एक रेशेदार पदार्थ होता है जो जानवरों की हड्डियों या फिर हड्डियों या स्किन को उबालकर निकाला जाता है। इसे प्रॉसेस कर चमकदार और लचीला बनाया जाता है। जिलेटिन का एक अन्य उपयोग जेली बनाने में होता है।

आपको  कैप्सूल के पैकेट या डिब्बे पर उसमें मौजूद मेडिसिन कंटेंट की जानकारी तो होती है। लेकिन, ज्यादातर मामलों में कंपनियां आपको ये नहीं बतातीं कि कैप्सूल कवर जिलेटिन से बना है।  आपको ये जानकर हैरानी होगी कि फिलहाल करीब 98 फीसदी दवा कंपनियां पशुओं के उत्पादों से बनने वाले जिलेटिन कैप्सूल का इस्तेमाल कर रही हैं। जिससे साफ जाहिर होता है कि ऐसा करना शाकाहारी लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला है। आपको बता दें कि इस सिलसिले में मेनका गांधी ने भी कहा था कि जिलेटिन कैप्सूल का इस्तेमाल देश के लाखों शाकाहारियों लोगों की भावनाओं को आहत पहुंचाने वाला है।

यह बात देश के ज्यादातर लोगों के सामने उस वक्त आई जब स्वास्थ्य मंत्रालय ने “जिलेटिन से बने कैप्सूल की जगह पौधों से बने कैप्सूल” बनाने के लिए विशेषज्ञों की एक कमिटी का गठन किया। इस कमिटी का गठन साल 2017 मार्च में किया गया था। इस कमेटी का गठन तत्कालीन केंद्रीय महिला एवं बाल कल्याण मंत्री मेनका गांधी द्वारा स्वास्थ्य मंत्रालय को “जिलेटिन कैप्सूल” की जगह पौधों से बने कैप्सूल के इस्तेमाल के सुझाव के बाद किया गया था।

इस संबंध में आवाज उठाते हुए मेनका गांधी ने ये भी कहा था कि बहुत से लोग केवल इस वजह से जिनेटिक से बनी दवाईयों का सेवन नहीं करते हैं क्योंकि कैप्सूल का ऊपरी हिस्सा जानवरों की हड्डियों और कुछ दूसरी चीज़ों से बना होता है। मेनका गांधी ने स्वास्थ्य मंत्रालय में चिट्ठी लिखकर ये कहा कि जिलेटिन की जगह पौधों की छाल या उनसे निकलने वाले रस से कैप्सूल कवर तैयार किए जाने चाहिए। इसे सेल्यूलोज कहा जाता है।  इस बारे में जैन धर्म के अनुयायियों ने भी स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा के सामने अपनी बात रखी थी।